जब दरख़्त पर फल आने लगे…

जब दरख़्त पर फल आने लगे,

लोग हर तरफ़ से निशाना लगाने लगे,

ये किसको ख़बर उसने क्या-क्या सहा,

लोग उसकी मेहनत को अपना बताने लगे।

दो जहाँ के दरम्याँ इतना फ़ासला रहा,

वो सहता रहा, लोग झुकाने लगे

कौन सीखता है भला बातों से यहाँ,

चोटें मिलती रहीं मौसम समझ आने लगे।

तुम जानते हो क्या ख़मोशी में क्या है छिपा,

परतें खुलने लगीं लोग कसमसाने लगे,

सौ सच हैं जिनकी कोई गवाही नहीं,

एक झूठ से लिपटकर सब कसमें खाने लगे।

हादसों ने मिटा दिया था खोने का डर,

कलियाँ खिलने लगीं,भँवरें मंडराने लगे

आँसुओं को पिया तो खुशियाँ मिलने लगीं,

सूखी टहनी पर पत्ते खिलखिलाने लगे।

दूसरों के लिए जिया तो झोली भरने लगी,

अश्कों में भी मोती मुस्कुराने लगे,

जीना है ज़िदगी में तो दरख्त सा जिओ,

जो मरकर भी दूसरों के काम आने लगे।

याद रहेगा ये दौर हमको सदा,

शहर थमने लगे,गाँव बुलाने लगे,

मुसीबत में निखरती है शख्शियतें यहाँ

लोग पुराने पीपल की पनाह में वक्त बिताने लगे…

© abhishek trehan

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