जब दर्पण को देखा तो ऐसा लगा…

जब दर्पण को देखा,

तो ऐसा लगा,

जैसे ख़ुद से मिले,

एक अरसा हुआ है।

भटकता रहा हूँ,

मुसाफ़िरों की तरह से,

जैसे मंजिलों के लिए,

कोई तरसा हुआ है।

जिदंगी की उलझनों,

और कशमकश में,

बेमौसम ही कोई,

बादल बरसा हुआ है।

ना दिखती कहीं है,

ना मिलती कहीं है,

क्या दूर मुझसे

मेरा कोई हिस्सा हुआ है।

ठोकरें भी मिली हैं,

नफ़रते भी मिली हैं,

अभी खत्म कहाँ,

ये किस्सा हुआ है,

किस्मत भी शायद,

कुछ रूठी हुई है,

दर्पण भी हमसे,

गुस्सा हुआ है…

© abhishek trehan

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