गलतफ़हमी

आज इतवार का दिन था। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी। राजीव ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ से आवाज आयी। हेलो बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है। हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।

फोन रख कर वापिस कमरे में आ कर राजीव ने नेहा को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।

यह सुनकर नेहा का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है। वह गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राजीव हक्का बक्का होकर उसे देखता ही रह गया।

नेहा गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी। दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं इसकी परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे सेंकने लगी कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ किसी तरह से ख़त्म किया।

वह तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ, खाएँ और वापिस जाएँ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने राजीव के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राजीव स्टेशन से लाया था।

मां ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राजीव ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं। जैसे मानो नेहा के नींद टूटी हो नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…। चलो आप अंदर तो आओ।

थोड़ी देर बाद पापा ने कहा नेहा, बातें ही करती रहोगी या कुछ फिर कुछ खिलाओगी भी। यह सुनकर नेहा को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।

नेहा बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। थोडी देर बाद राजीव कुछ काम से बाहर चला गया। राजीव के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राजीव ने सच में बताया नहीं था कि हम आ रहे हैं ”

अचानक नेहा के मुँह से निकल गया उसने सिर्फ यह कहा था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।

फिर क्या था नेहा की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या है। दुखी मन से उन्होंने नेहा को समझाया बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना चाहिये।

नेहा के मम्मी पापा को स्टेशन छोडकर राजीव घर वापस आ चुके थे।वातावरण में अजीब सी खमोशी थी। थोडी बाद नेहा चाय लेकर आयी राजीव ने देखा उसकी की आँखों में ऑंसू हैं उन्होनें पूछा नेहा क्या बात है ?उत्तर में नेहा ने बस इतना ही कहा कि मैं आज बहुत शर्मिंदा हूं,मुझे माफ कर दो, आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा.! राजीव ने उसे गले से लगा लिया वह समझ गये थे कि नेहा को आज जिंदगी का बहुत बडा सबक मिल चुका है।

चित्र स्रोत- गूगल इमेज

साभार-All World Gayatri Pariwar

Leave a Reply