खोने को कुछ नहीं है…

खोने को कुछ नहीं है,

पाना भी कुछ कहाँ है,

दूर दिखता है कोई साया,

उठता यादों का बस धुआँ है।

पाया था जो वो है खोया,

खोया भी गया कहाँ है,

मज़िल सबकी वही है,

मुसाफ़िर सब यहाँ है।

तुम साथ नहीं तो क्या है,

संग यादों की तपिश है,

तेरा बिना अधूरा हूँ मैं,

बड़ी मुकम्मल सी ये कशिश है।

लंबा है ये सफ़र भी,

हमसफ़र संग नहीं है,

प्यासा है कोई मुसाफ़िर,

पानी कहीं नही है।

तकलीफ़ तब है होती,

टूटती हैं जब डोरें,

टूट जाए जब कोई डोरी,

जुड़ती वो फिर कहाँ है।

कुछ हसरतें हैं अधूरी,

कुछ काम हैं जरूरी,

ज़िदगी चल रही है,

हम जीते अब कहां है…

(स्वलिखित)

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