खुशियां कम और अरमान बहुत हैं

खुशियां कम और अरमान बहुत हैं

इस शहर में हर कोई परेशान बहुत है

करीब जाकर देखा तो मिलीं उनमें भी कमियां

दूर से तो उसकी शख्शियत आलीशान बहुत है।

कहने को तो नहीं है सच का कोई मुकाबला

लेकिन आज की दुनिया में झूठ की जान-पहचान बहुत है

जरुरत पड़ी उन्हें तो हर शख्श मुकर गया

कहने को तो इस शहर में उनके कद्रदान बहुत हैं।

मुमकिन है वक्त मिटा दे यादों को उनकी

लेकिन कैसे भुला दें उनको जिसके मुझ पर अहसान बहुत हैं

मुश्किल से मिलता है वो जिसे कह सकें हमारा

वैसे तो इस शहर में इन्सान बहुत हैं।

सुना था मिलती हैं मोहब्त के बदले मोहब्तें

जब मेरी बारी आयी तो यें जम़ाना क्यों हैरान बहुत है

जिस शहर में था इश्क का आशियाना

उस शहर में पत्थर के ख़रीदार बहुत हैं।

Leave a Reply