कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा…

यादों की थोड़ी सी मिट्टी लेकर ,

आज उनसे दो अक्स बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज यारों की महफिल में,

फिर से कुछ रंग जमाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

फिर तोड़कर उन चेहरों को,

उनसे फिर दो शख्श बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज फिर से पुरानी तस्वीर लेकर,

साथ में कुछ तो वक्त बिताना,

कुछ तुम जैसा कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ….

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