कुछ जल गए कुछ बुझ गए

कुछ जल गए कुछ बुझ गए,

कुछ राख बनकर रह गए,

देखे थे तेरे संग जो सपने,

वो बस ख्वाब बनकर रह गए।

कुछ कह गए कुछ सह गए,

कुछ याद बनकर रह गए,

संग वक्त के कुछ जख्म भर गए,

कुछ बस दाग़ बनकर रह गए।

कभी आस में कभी काश में,

कभी अल्फाज़ बनकर रह गए,

ना तुमने कही ना हमने सुनी,

बस वो आवाज़ बनकर रह गए।

कभी धूप में कभी रेत में,

कभी तलाश बनकर रह गए,

ढूंढ़ते रहे तुम्हें हम दर-ब-दर,

और तुम प्यास बनकर रह गए।

कभी रस्म में कभी रिवाज़ में,

कभी कारोबार बनकर रह गए,

वक्त को इश्क पर तरजीह मिली,

और हम कर्ज़दार बनकर रह गए।

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