कभी इधर चल दिए कभी उधर चल दिए

कभी इधर चल दिए,

कभी उधर चल दिए,

जिसने जिधर कहा,

हम उधर चल दिए।

अफ़सोस है मँज़िलें,

फिर भी रूठी ही रहीं,

मुसाफिरों की तरह हम भी,

फिर बेख़बर चल दिए।

कभी ख़ामोश तुम रही,

कभी चुप हम रहे,

साथ चलने की ज़िद में,

देखो हम किधर चल दिए।

ना तुम्हें हुई ख़बर,

ना हमें ही पता चला,

अंजाम से हो बेख़बर,

हम फिर बेअसर चल दिए।

दुनिया बुलाती भी रही,

दुनिया भुलाती भी रही,

बिना किसी के हुए हम,

फिर बेफ़िकर चल दिए।

ना तुम ही समझ सकी,

ना हम ही समझ सके,

बन के नासमझ दोनों,

फिर इधर-उधर चल दिए।

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