उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है ?

उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है

ढलती हुई ये शाम उदास सी क्यूं है

खुशियों का ठौर कहां हम ढूंढे

मंजिलें मुझसे नाराज़ सी क्यूं है

जो मिला है उसकी कद्र कहां है

जो नहीं है उसकी तालाश सी क्यूं है

हर चेहरे के पीछे छिपा एक चेहरा है

झूठ में सच की आस सी क्यूं है

बाहर दिवाली दिलों में अंधेरा है

पानी में रहकर भी प्यास सी क्यूं है

तारों की महफिल पे चांद का पहरा है

चांदनी इतनी उदास सी क्यूं है

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