उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है…

उसकी हर बात,

एक राज़ सी क्यूं है,

ढलती हुई ये शाम,

उदास सी क्यूं है।

खुशियों का ठौर,

कहां हम ढूंढे,

मंजिलें मुझसे,

नाराज़ सी क्यूं है।

जो मिला है,

उसकी परवाह कहां है

जो नहीं है,

उसकी तालाश सी क्यूं है।

हर चेहरे के पीछे,

छिपा एक चेहरा है,

झूठ में सच की,

आस सी क्यूं है।

बाहर उजाला,

दिलों में अंधेरा है,

उम्मीदें इतनी,

हताश सी क्यूं हैं।

जिंदगी भी हर पल,

छलक रही है,

एक बूंद की फिर भी,

प्यास सी क्यूं है।

दुनिया कह रही है,

कुछ तुम बदल गए हो,

दिल में फिर भी उठती,

एक काश सी क्यूं है।

जाने किस बात का,

गुरूर है हवाओं को

ज़िदंगी में इतनी,

ख़राश सी क्यूं है…

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