उलझे हुए कुछ सपने हैं उलझी हुई कुछ ख्वाहिश हैं…

उलझे हुए कुछ सपने हैं,

उलझी हुई कुछ ख्वाहिश हैं,

दिल में गहरी तड़पन है,

कहीं दूर उनकी रिहाइश है।

उनके बिना मैं अधूरा हूं,

अधूरी जिंदगी की हर फरमाइश है,

इल्ज़ाम मुझ पर हजारो हैं,

बड़ी मुश्किल इश्क की आजमाइश है।

मैं तेरे मन की ख़ामोशी हूं,

तुम मेरे मन की हो आवाज़,

मैं तुम्हारी उलझी कहानी हूं,

मेरी कहानी की तुम हो अल्फाज़।

दूर तलक सुलगती हुई रेत है,

पानी की गहरी प्यास है,

दूर बहता कहीं एक दरिया है,

और साहिल मेरे पास है।

ये कैसी बेचैनी है,

कैसी ये साजिश है,

उलझन भी मीठी लगती है,

नए मौसम की पहली बारिश है।

मेरा मुझमें कुछ बचा नहीं,

सबकुछ नाम तेरे कर आया हूं,

बस जाओ मेरी अब रूह में तुम,

बस इतनी सी गुज़ारिश है…

(स्वलिखित)

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