उम्मीदों का दिया कभी बुझता नहीं है

एक मुसाफिर अपनी मंजिल की ओर तेजी से बढ़ रहा था, रात का समय था,चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था, आगे का मार्ग घने जंगल से होकर गुजरता था। उसके पैर भी लंबी यात्रा से थक गए थे और अब चलने से इंकार कर रहे थे। उसने रात्रि विश्राम करने का निश्चय किया और उपयुक्त स्थान की तलाश करने लगा।

जगह सूनसान थी, दूर दूर तक आबादी का नामोनिशान तक नहीं था। काफी मशक्कत करने के बाद उसे एक छोटा सा मंदिर दिखाई दिया। पास जाने पर मुसाफिर ने पाया कि वहां कोई नहीं है, मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद हो चुके थे। गर्भगृह के बाहर चार दिये जल रहे थे जिसके कारण पूरे मंदिर में हल्की रोशनी फैल रही थी।

मुसाफिर बेहद थका हुआ था इसलिए जमीन पर लेटते हुए ही वह गहरी नींद में सो गया था। रात्रि के अंतिम पहर में अचानक उसकी नींद एक मधुर आवाज़ से टूट गई, यह मधुर आवाज़ मंदिर के गर्भगृह के पास से आती हुई प्रतीत हो रही थी।

पहले तो उसे कुछ भय हुआ फिर उसे याद आया कि वह तो मंदिर में है, ईश्वर के घर में भला भय कैसा, उसने खुद से यह कहा और गर्भगृह के समीप पहुंच गया। वहां पहुंचकर उसने जो देखा उसे देखकर उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसने देखा कि मंदिर के गर्भगृह के बाहर रखे चारों दिये आपस में बात कर रहे हैं। वह मुसाफिर वहीं बैठकर ध्यान से उनकी बातें सुनने लगा।

पहला दिया बोल रहा था ” मेरा नाम शांति है, पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है, चारों तरफ आपाधापी और लूट-मार मची हुई है, मैं यहाँ अब और नहीं रह सकता। ” और ऐसा कहते हुए, कुछ देर में वह दिया बुझ गया।

कुछ देर तक वातावरण में शांति छाई गई तभी दूसरा दिया बोला ” मेरा नाम विश्वास है, और मुझे लगता है झूठ और फरेब की इस दुनिया मेरी भी यहाँ किसी को कोई ज़रुरत नहीं है, मैं भी यहाँ से जा रहा हूँ। ”, और कुछ ही क्षणों में वह दूसरा दिया भी बुझ गया ।

यह सब देखकर वह मुसाफिर आश्चर्यचकित था, उनकी बातें सुनकर वह दुखी भी था उनकी बातों में वह जीवन की सच्चाई को महसूस कर रहा था। वह अपने इन ख्यालों में खोया हुआ था कि तीसरा दिया धीमी आवाज में कहने लगा “मैं प्रेम हूँ, मेरे पास जलते रहने की ताकत है, पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास फुर्सत नहीं है, दूसरों की बात तो दूर लोग अपनों से भी प्रेम करना भूल गए हैं, मुझसे ये सब और नहीं सहा जाता है मैं भी इस दुनिया से जा रहा हूँ। “

तीसरा दिया अभी बुझा ही था कि वहां कहीं से एक पतंगा आ गया। दियों को बुझा हुआ देखकर वह घबरा गया, उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होकर बोला “अरे, तुम दिये जल क्यों नहीं रहे हो, तुम्हे तो अंत तक जलना है, अभी अंधकार समाप्त नहीं हुआ है, तुम इस तरह बीच में हमें कैसे छोड़कर कैसे जा सकते हो?”

तभी चौथा दिया जो शांति से सबकी बात सुन रहा था और चुपचाप जल रहा था मधुर स्वर में बोला ” प्यारे पतंगे घबराओ नहीं, मेरा नाम आशा है और जब तक मैं जल रहा हूँ हम बाकी दियों को फिर से जला सकते हैं। “

यह सुन कर मुसाफिर की आंखें चमक उठीं वह चौथे दिये के समीप आ गया और उसने आशा के बल पर शांति,विश्वास, और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया। चारों दीपक पुनः अपनी पूरी क्षमता से अंधकार को मिटाने में जुट गए।

कुछ देर बाद सुबह हो गई और मुसाफिर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला उन चारों दीपकों ने उसके भीतर के अँधेरे को नष्ट कर दिया था वह मन ही मन सोच रहा था कि जब जीवन में सबकुछ बुरा होते हुए दिखाई दे रहा हो, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आ रहा हो, अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, हमें उम्मीद हमेशा रखनी चाहिए क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि ये हर खोई हुई चीज हमें वापस दिल सकती है।

अपनी उम्मीदों के दिए को हमेशा जलाये रखिये, बस अगर ये दिया जलता रहेगा तो आप किसी भी दिये को प्रकाशित कर सकते हैं। जो हमसे दूर हो गया है उसे वापस पा सकते हैं क्योंकि जब तक साँस है तब तक आस है।

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