उन्हें शिकायत बहुत थी हमसे…

उन्हें शिकायत बहुत थी हमसे,

अब ख़ुद से शिकायत हो गई है,

पहले नफ़रत करने की ज़िद थी,

अब नफ़रत भी इबादत हो गई है।

उन्हें कितनी मोहब्बत थी हमसे,

अब कितनी सआदत हो गई है,

पहले साया भी मंज़ूर नहीं था,

अब अँधेरों की आदत हो गई है।

चेहरा तो अब भी वही है,

शायद सीरत बदल गई है,

पहले फ़ासलों की बहुत तलब थी,

अब नज़दीकियों से रिवायत हो गई है।

कुछ रूह में उतर गया था,

कुछ दिल में रह गया है,

कुछ ख्वाहिशें पूरी हुई हैं,

कुछ मलाल रह गया है।

बंजर नहीं है आँखें,

अभी बाकी कुछ नमी है,

पुरानी चोट भर गई है,

बाकी निशान रह गया है।

पहले इजाज़त नहीं मिली थी,

अब नज़रें मिल रही हैं,

पहले चाँद से इश्क हुआ था,

अब शिकायत चल रही है…

© abhishek trehan

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