उनसे ये कहना वाजिब नहीं है…

उनसे ये कहना,

वाजिब नहीं है,

चाँद से भी ज्यादा,

प्यारे लग रहे हो।

उनसे अब कहना,

मुनासिब यही है,

जैसे भी हो,

बस हमारे लग रहे हो।

हज़ारों मुश्किलें हैं,

मीलों के फ़ासले हैं,

अंबर में टिमटिमाते,

सितारे लग रहे हो।

शाम ढ़ल चुकी है,

रात चल रही है,

अँधेरों में उम्मीदों के,

सहारे लग रहे हो।

आँखों में सपने हैं,

सपनों की दुनिया है,

दुनिया के सपनों में,

मँज़िलों के किनारे लग रहे हो।

वक्त ठहर गया है,

ज़िदंगी बदल गई है,

इस बदलते हुए मौसम में,

तुम हमारे लग रहे हो…

© abhishek trehan

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