इंसानियत

डाक्टर अभिनव का कोलकाता में बड़ा नाम था. वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ थे. वे बेहद मिलनसार और मृदुभाषी थे. वे अमीर गरीब सभी के लिए सामान रूप से उपलब्ध थे. रोगी का आधा रोग उनकी दवा से और आधा उनके व्यवहार, उनकी संवेदनशीलता, उनकी प्रेरक बातों से ठीक हो जाता था. बड़ी भीड़ रहती थी उनसे मिलने वालों की, लाइन में बैठा एक बूढ़ा भी अपनी बारी का इंतजार कर रहा था वह ह्रदय की गंभीर समस्या से जूझ रहा था.

लंबे समय के बाद उसका नंबर आ ही गया उसने कमरे में प्रवेश किया और स्टूल पर बैठ गया. आप नाम क्या है डाक्टर ने पूछा उत्तर मिला डाक्टर विनोद तिवारी भूतपूर्व बाल रोग विशेषज्ञ. यह सुनते ही मानो डाक्टर अभिनव को बिजली का झटका लगा हो. उन्होंने उनकी तरफ देखा और भाव शून्य हो गये उनके सामने 30 वर्ष का दृश्य तेजी से घूम गया.

उस दिन बारिश तेज़ हो रही थी, रह रह कर बिजली चमक उठती थी जिसकी रोशनी में उसके माथे पर पसीने की बूँदें दिख जाती थीं. वह पूरी तरह से भीग गया था. पर इन सब बातों से बेखबर वह तेज कदमों से बढ़ता जा रहा था. उसने बाहों में चादर से कोई चीज़ लपेट रखी थी जिसे मजबूती से अपने सीने से चिपकाकर वह तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था. खराब मौसम भी उसके इरादों को डिगा नहीं पा रहा था. उसका बच्चा बुखार से तप रहा था और वह उसे लेकर डॉक्टर तिवारी के पास जा रहा था. वह कोलकाता के जाने माने बाल रोग विशेषज्ञ थे.

इस खराब मौसम में उसे कोई साधन नहीं मिल पा रहा था इसलिए वह अपने बच्चे को लेकर पैदल ही डाक्टर के पास जाने के लिए निकल पड़ा था. अपने बच्चे में इंसान की जान बसती है और आज उसकी जान मुश्किल में थी इसलिए बिना किसी बाधा की परवाह किए वह डाक्टर की क्लीनिक तक पहुंच ही गया था. पर लगता था कि किस्मत उसे अभी और आजमाना चाहती थी क्योंकि क्लीनिक बंद हो चुका था और अब उसके पास एकमात्र विकल्प डाक्टर के घर जाकर अपने बच्चे को दिखाना बचा था.

मरता क्या न करता वह बच्चे को गोद में उठाए हुए डाक्टर तिवारी के घर भी पहुंच गया पर मौसम खराब होने के कारण उसे देर हो गई थी और डाक्टर साहब सोने के लिए चले गए थे. बड़ी मनुहार के बाद चौकीदार ने 500 रूपये का नोट उसके हाथ से लेकर अपनी जेब के हवाले किया और डाक्टर को उठाने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद उसे भद्दी गालियाँ सुनाई देने लगीं. जब चौकीदार वापस आया तो उसने कहा डाक्टर ने मरीज को देखने से इंकार कर दिया है. डाक्टर को अपनी नींद में खलल पसंद नहीं आया था और उसने चौकीदार से कहलवा भेजा था कि मरता है तो मर जाए पर मेरी नींद में दुबारा बाधा मत डालना.

आज इतिहास खुद को दोहरा रहा था. वही डाक्टर तिवारी जिन्होंने कभी उसे मरने के लिए छोड़ दिया था आज स्वयं गंभीर रोग से पीड़ित होकर डाक्टर अभिनव के सामने बैठे थे. डाक्टर अभिनव का मन कड़वाहट से भर गया था . एक पल के लिए उन्हें लगा कि वह उसका इलाज नहीं कर सकते. उनका मन तीस साल की अपनी सारी पीड़ा को बीमार डाक्टर तिवारी के सामने निकाल देना चाहता था. वह उनको मजबूरी और लाचारी का अहसास करा देना चाहता था. आज डाक्टर अभिनव के पास मौका था डाक्टर तिवारी के अहंकार को चूर चूर कर देने का.

डाक्टर अभिनव के पिता ने बड़ी कठिनाइयों और मुश्किलों से उन्हें यहां तक पहुंचाया था. उनका कुछ समय पहले अल्प आयु में ही ह्रदय रोग के कारण स्वर्गवास हो चुका था. वह हमेशा डाक्टर अभिनव के दिल में बसते थे. अपने पिता की एक तस्वीर उन्होंने अपने हास्पिटल के कमरे में अपनी कुर्सी के सामने दीवार पर लगा रखी थी. डाक्टर अभिनव की नजरें अपने पिता की तस्वीर पर गयीं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी उन्हें अपने बेटे पर नाज़ था. डाक्टर अभिनव ने डाक्टर तिवारी के साथ भी वही व्यवहार किया जैसा वह अन्य मरीजों के साथ करते थे. बूढ़े डाक्टर तिवारी उन्हे धन्यवाद देते हुए लड़खड़ाते हुए कदमों से बाहर चले गए.

डाक्टर अभिनव भी अब मरीजों को देखने के बाद उठकर घर जाने लगे. उन्होंने अपना बैग उठाया और पिता की तस्वीर को प्रणाम किया. उन्हें महसूस हुआ कि तस्वीर में मुस्कान गहरी और आंखों की चमक बढ़ गई है. उन्होंने अपने पिता के बेटे होने के फर्ज को अदा कर दिया था.

Leave a Reply