अपना कहकर छीन लिया जो कभी था मेरे संग…

अपना कहकर छीन लिया,

जो कभी था मेरे संग,

तेरा भी मुझमें कुछ रह गया,

जब चढ़ा इश्क का रंग।

बन जाओ तुम हर ख्वाहिश मेरी,

बन जाऊं मैं तुम्हारी हर पसंद,

फिर तेरे संग उड़ जाऊं मैं,

जैसे हवा संग उड़े पतंग।

कुछ पा लिया,कुछ खो दिया

कुछ छूट गया बेरंग,

रूह से रूह जब जुड़ गई,

हर रंग हुआ नौरंग।

सूना-सूना सा जग मेरा,

फ़ीकी लगती है हर सुगंध,

मैं साया, तुम ज़िद मेरी

मैं निश्चय, तुम मेरी सौगंध।

ठहरे पानी जैसा इश्क मेरा,

तुम जल में उठती तरंग,

छू लिया तो हलचल मच गई,

जैसे नस-नस में उठे उमंग…

(स्वलिखित)

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