जब दर्पण को देखा तो ऐसा लगा…

जब दर्पण को देखा,

तो ऐसा लगा,

जैसे ख़ुद से मिले,

एक अरसा हुआ है।

भटकता रहा हूँ,

मुसाफ़िरों की तरह से,

जैसे मंजिलों के लिए,

कोई तरसा हुआ है।

जिदंगी की उलझनों,

और कशमकश में,

बेमौसम ही कोई,

बादल बरसा हुआ है।

ना दिखती कहीं है,

ना मिलती कहीं है,

क्या दूर मुझसे

मेरा कोई हिस्सा हुआ है।

ठोकरें भी मिली हैं,

नफ़रते भी मिली हैं,

अभी खत्म कहाँ,

ये किस्सा हुआ है,

किस्मत भी शायद,

कुछ रूठी हुई है,

दर्पण भी हमसे,

गुस्सा हुआ है…

© abhishek trehan

दुनिया से छुप-छुपकर ही सही….

दुनिया से छुप-छुपकर ही सही

थोड़ा ख़ुद के लिए भी जिया करो

किसी को तेरी फिक्र नहीं

अपनी परवाह ख़ुद किया करो

एक दूसरों की ख़िदमत के सिवा

दुनिया में और भी काम हैं

कुछ ख्वाहिशें सीने में दफ़न हैं

कुछ पल उन्हें भी दिया करो

हँसते रहे तुम हर दफ़ा

शिकवा कभी किया नहीं

हर बार मन मसोस लिया

कभी किसी से कुछ कहा नहीं

कह रही है ज़िदंगी

ख़ुद को जरा सम्हाल लो

दूसरों के लिए बहुत जी लिए

थोड़ा ख़ुद के लिए भी जिया करो

साँसे खर्च हो रहीं

पाबंद ज़िदंगी का हिसाब है

वक्त बहुत कम है

कोरी सपनों की अभी किताब है

एक जनम काफ़ी नही

हर जनम में तुम मिला करो

मैं तुम्हारा कर्ज़दार हूं

इस कर्ज़ से मुझे रिहा करो…

© abhishek trehan

चुपके से रात आती है…


चुपके से रात आती है,

सोए दर्द जगाती है,

तन्हाई की धुन बजती है,

पानी में आग लगाती है।

वही गलती फिर मैं करता हूं,

यादों के चेहरे पढ़ता हूं

रात की दहलीज़ पर पलकें बिछाकर

इंतज़ार सुबह का करता हूं।

नींद से नहीं कोई शिकवा है,

पुरानी बातें हमें जगाती हैं,

बिस्तर बुलाता रहता है,

रात कुर्सी पे गुज़र जाती है।

जिसने हमको ये रोग दिया,

उसने जाने क्या सोच लिया,

पहले चोट लगी फिर दर्द बढ़ा,

फिर ख़ुद को उसने रोक लिया।

कुछ बूँदें आँखों से छलकती हैं,

कुछ बिन बरसे रह जाती हैं,

संग वक्त के कुछ जख़्म भर जाते हैं,

कुछ लकीरें दिल पे रह जाती हैं।

सूरज भी रोज़ निकल रहा है,

ज़िदंगी भी रोज़ आज़माती है,

दिमाग दिन के संग चलता है,

रात दिल का साथ निभाती है…

© abhishek trehan

दूर अब बहुत आ चुका हूं मैं…

दूर अब बहुत,

आ चुका हूं मैं,

रात को भी दिन,

बता चुका हूं मैं।

हादसे लेकिन अभी,

ख़त्म कहां हुए,

हादसों को भी आदत,

बना चुका हूं मैं।

कहाँ से लाऊँ लफ़्ज़ वो,

जो तुम्हें सुनाई दे,

पलकों को तुम मूंद लो,

शायद सच दिखाई दे।

पहले तो बस चाहत थी,

अब मजबूरी हो गई है,

तेरे इश्क की तलब क्या लगी,

ज़िदंगी जरूरी हो गई है।

उन्हें हमारी फिक्र नहीं,

मैं शुक्रगुज़ार हूं,

रिश्तों की आंच में हाथ बहुत,

जला चुका हूं मैं।

ये बस दिल जानता है,

या जानता हूं मैं,

हमने तुम्हें खोया है,

या खुद को पा चुका हूं मैं…

© abhishek trehan

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ…

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ,

मँज़िलो पे नहीं रूकता,

मँज़िले दग़ा किया करती हैं,

कभी रास्ता नहीं मुकरता।

ये जरूरी नहीं है,

हर बात की वजह हो,

कभी परछाई नहीं है दिखती,

कभी चाँद नहीं निकलता।

हद से गुज़रने की कीमत,

हर बार चुकानी पड़ती है,

सिर्फ़ दर्द सहने से,

नसीब नहीं बदलता।

बातों के भी इस दुनिया में,

होते हैं कई मतलब,

आईना बदलने से,

रकीब नहीं बदलता।

सपनों को जीने के लिए,

नासमझ होना पड़ता है,

समझदारों की दुनिया में,

कोई दिल की नहीं सुनता।

आम हो गई है,

जो ख़ास थी कहानी,

मन की रेत पर अब,

सिर्फ़ तेरा निशान नहीं मिलता…

© abhishek trehan

पहले ख़ुद को लुटाया था…

पहले ख़ुद को लुटाया था,

अब आदत बना ली है,

पहले इश्क चुभता था,

अब इबादत बना ली है।

मिले हैं जख़्म कहाँ से,

अब इसका नहीं है मतलब,

पहले पेड़ कट गया था,

अब कश्ती बना ली है।

जिंदगी से हर कदम पर,

शिकायत यही रही है,

पहले जवाब नहीं मिले थे,

अब शर्तें बढ़ा ली है।

माना थी रात गहरी,

हम फिर भी चल रहे थे,

पहले रास्ता नहीं पता था,

अब गिरकर संभल रहे हैं।

कुछ कोशिशों में कमी थी,

कुछ लकीरों से मलाल है,

खोना नहीं था तुमको,

पाने का नहीं सवाल है।

पहले कुछ नहीं लिखा था,

अब डायरी बना ली है,

पहले तजुर्बे कम मिले थे,

अब शायरी बना ली है…

© abhishek trehan

जुबां को खामोश रखा था…

जुबां को खामोश रखा था,

आँखो से बयां हो गया,

दोनो बराबर ज़िद्दी थे,

इश्क आसान हो गया।

फ़ना होने की इजाज़त थी,

जीने का इंतज़ाम हो गया,

मौसम ने करवट बदली थी,

दिल उनपे मेहरबान हो गया।

डोर से डोर जब जुड़ने लगी,

दूर हर ग़ुमान हो गया,

कल तक जो मेरा हिस्सा था,

किसी और का आसमान हो गया।

ना पाने की बेचैनी थी,

ना खोने का बहाना था,

डूबना ही बस मकसद था,

ख़ुद को ख़ुद से आज़माना था।

अजीब सा कोई रिश्ता था,

अजीब सा कोई फ़साना था,

दिल में तलब उसकी उठती थी,

अपना मुकाम भी बनाना था।

अब दूर बहुत हम आ चुके,

वो किस्सा बहुत पुराना था,

किसी की यादें तंग कर रहीं

नींद का तो बस बहाना था…

© abhishek trehan

उन्हें शिकायत बहुत थी हमसे…

उन्हें शिकायत बहुत थी हमसे,

अब ख़ुद से शिकायत हो गई है,

पहले नफ़रत करने की ज़िद थी,

अब नफ़रत भी इबादत हो गई है।

उन्हें कितनी मोहब्बत थी हमसे,

अब कितनी सआदत हो गई है,

पहले साया भी मंज़ूर नहीं था,

अब अँधेरों की आदत हो गई है।

चेहरा तो अब भी वही है,

शायद सीरत बदल गई है,

पहले फ़ासलों की बहुत तलब थी,

अब नज़दीकियों से रिवायत हो गई है।

कुछ रूह में उतर गया था,

कुछ दिल में रह गया है,

कुछ ख्वाहिशें पूरी हुई हैं,

कुछ मलाल रह गया है।

बंजर नहीं है आँखें,

अभी बाकी कुछ नमी है,

पुरानी चोट भर गई है,

बाकी निशान रह गया है।

पहले इजाज़त नहीं मिली थी,

अब नज़रें मिल रही हैं,

पहले चाँद से इश्क हुआ था,

अब शिकायत चल रही है…

© abhishek trehan

उनसे ये कहना वाजिब नहीं है…

उनसे ये कहना,

वाजिब नहीं है,

चाँद से भी ज्यादा,

प्यारे लग रहे हो।

उनसे अब कहना,

मुनासिब यही है,

जैसे भी हो,

बस हमारे लग रहे हो।

हज़ारों मुश्किलें हैं,

मीलों के फ़ासले हैं,

अंबर में टिमटिमाते,

सितारे लग रहे हो।

शाम ढ़ल चुकी है,

रात चल रही है,

अँधेरों में उम्मीदों के,

सहारे लग रहे हो।

आँखों में सपने हैं,

सपनों की दुनिया है,

दुनिया के सपनों में,

मँज़िलों के किनारे लग रहे हो।

वक्त ठहर गया है,

ज़िदंगी बदल गई है,

इस बदलते हुए मौसम में,

तुम हमारे लग रहे हो…

© abhishek trehan

माँ…

जब जिक्र तेरा हुआ होगा
सजदे पे कोई झुका होगा
जहां पांव तेरे पड़े होंगे
वो मकान घर बना होगा

वो कितनी बार जगी होगी
जब चैन से तू सोया होगा
वो कितनी बार उठी होगी
जब रात में तू रोया होगा

रोकर भी दुआ दी होगी
जब तूने दिल उसका तोड़ा होगा
वो टूटकर फिर बिखरी होगी
जब तूने घर उसका छोड़ा होगा

देकर आँसू उसकी आँखों में
तू बाहर पत्थरों में खोया होगा
देख कर तेरी नासमझी को
ख़ुदा भी तुझ पर रोया होगा…
© abhishek trehan