तुमसे ही हर ख़ुशी है…

तुमसे ही हर ख़ुशी है,

तुमसे ही सारे हैं ग़म,

सब दर्द भी तुम्हीं से,

तुम ही हर दर्द पर हो मरहम।

ये ज़िदगी है तुम्हारी,

तुम हो ज़िदंगी की सरगम,

मैं भटका हुआ हूं दरिया,

तुम ही हो मेरा संगम।

कैसी है ये मोहब्बत,

कैसी है ये उलझन,

मैं धड़क रहा हूं तुझमें,

तुम हो मेरे दिल की धड़कन।

तेरी रूह में उतरकर,

मिला है एक समुंदर,

जीता हूं मैं ख़ुद में बेशक,

पर जिंदा हूं तेरे अंदर।

अधरों से मेरे लगकर,

बाँसुरी बन गई हो,

मंज़िलें तो बहुत हैं,

तुम आख़िरी बन गई हो।

तेरे इश्क की तलब भी,

रहती है मुझे हरदम,

मैं प्यासा सा एक मुसाफ़िर,

तुम सुबह की पहली शबनम…

आंगन का तेरे मैं बादल होना चाहता हूं…

आंगन का तेरे,

मैं बादल होना चाहता हूं,

रातों का तेरी,

मैं काजल होना चाहता हूं।

तेरे दीदार की तलब,

बेशुमार लग गई है,

अदाओं का तेरी,

मैं कायल होना चाहता हूं।

पैमानों का नशा तो,

फिर भी टूट जाता है,

निगाहों से तेरी,

मैं घायल होना चाहता हूं।

तेरे ज़िक्र ने बढ़ा दिया है,

मुश्किलों को मेरी,

हर ज़िक्र में तेरे,

मैं शामिल होना चाहता हूं।

लोग मांगते हैं खुदा से,

हर दिन नया कुछ,

मैं इश्क में तेरे,

कामिल होना चाहता हूं।

सिलसिले ख़त्म करना,

अब मुनासिब नहीं है,

टूटकर मैं अब फिर से,

काबिल होना चाहता हूं…

(स्वलिखित)

अपने ही घर में फिर से मेहमान हो गया हूं…

अपने ही घर में फिर से,

मेहमान हो गया हूं,

जब से मिला हूं तुमसे,

ख़ुद से अंजान हो गया हूं।

यूं तो हमें भी बहुत थे,

काम ज़िदंगी में,

भुलाकर सारी दुनियादारी,

फिर से नादान हो गया हूं।

हद में ही रहकर हमेशा,

इश्क किया है तुमसे,

आँखों मे पढ़ लो इशारे,

मैं बेज़ुबान हो गया हूं।

बनकर मेरी तमन्ना,

तुम कमाल कर रही हो,

शामिल होकर हर दुआ में,

मुझे निहाल कर रही हो।

सोचता हूं तुमसे मिलकर,

कुछ और अब ना सोचूं,

देखकर तुझमें ख़ुद को,

कुछ और अब ना देखूं।

अलग मेरा पता नहीं है,

तेरा पता ही है मेरा,

मिटाकर ख़ुद को तुझमें,

फिर से गुमनाम हो गया हूं…

(स्वलिखित)

आप वैलेंटाइन दिवस पर उनसे क्या कहना चाहते हैं?

तुम वो तारीख़ हो,जो कभी बदलती नहीं,

मैं वो लहर हूं,जो कहीं पर ठहरती नहीं,

एक डर है तुम्हें पाकर फिर खो न दूं,

तुम बनके बारिश मुझ पर क्यों बरसती नहीं।

तुम हो वजह जीने की और सबब मरने का,

तुम बन के साया मुझ में ही क्यों बसती नहीं,

ढूंढ़ता फिर रहा हूं तुम्हे दर- ब-दर,

तुम कहां खो गई हो,क्यों दिखती नहीं।

दूरियों ने बढ़ा दिया है यादों का हौसला,

तुम बनके खु़शबू क्यों मुझमें महकती नहीं,

रात पर छा रहा है ये कैसा नशा,

तुम बन के हवा क्यों फिज़ा में चहकती नहीं।

ना रूका था ना रूकेगा, कभी किसी के

फ़ितरत इस दिल की कभी बदलती नहीं,

तेरी सोहबत की रहती है मुझको तलब,

ग़ैरों की महफ़िल में तबीयत अब बहकती नहीं।

तेरे बिना जीने में अब नहीं है मज़ा,

रातें भी हैं बेबस और धुंधली है हर सुबह,

मिल जाओ मुझे तुम बादलों की तरह,

पानी से प्यास अब बुझती नहीं…

(स्वलिखित)

दुनिया तो एक ही है पर सबकी अलग-अलग है…

दुनिया तो एक ही है,

पर सबकी अलग-अलग है,

मज़िल तो एक ही है,

पर कश्ती अलग-अलग है।

प्यासा है हर मुसाफ़िर,

पैमाने अलग-अलग हैं,

जाना है सबको यहां से,

बहाने अलग-अलग हैं।

मुकम्मल कुछ नहीं है,

बनावट अलग-अलग है,

लोग रूप के हैं दीवाने,

सजावट अलग-अलग है।

ज़िदंगी है कोई सपना,

अभी रात चल रही है,

कहीं आग लगी हुई है,

कहीं बरसात चल रही है।

जरूरत से ज्यादा सबकुछ,

होना भी एक नशा है,

पानी का रंग नहीं है,

पर किरदार अलग-अलग हैं।

जो शुरू होकर फिर ख़त्म ना हो,

ऐसा मेरा ख़ुदा है,

मालिक तो एक ही है,

गुनाहग़ार अलग-अलग हैं…

(स्वलिखित)

मिट्टी भी जमा की थी,खिलौने भी बना के देखे…

मिट्टी भी जमा की थी,

खिलौने भी बना के देखे,

धूप भी थी मुस्कुराई,

खुश्बू से हवा भी महके।

कहां चले गए हो,

क्यूं नज़र नहीं आते,

पराया फिर कर रहे हो,

अपना मुझे कहके।

कभी इसके लिए जिए हम,

कभी उसके लिए जिए तुम,

ज़िदगी की कश्मकश में,

कब अपने लिए जिए हम।

जीवन के इस सफ़र में,

कुछ ऐसे मोड़ हैं आते,

कहना होता भी है जरूरी,

पर कुछ कह नहीं पाते।

रोज़ जल रहे हैं,

फिर भी ख़ाक नहीं हुए हैं,

कुछ साथ का नशा है,

कुछ मिज़ाज भी हैं बहके।

कितना भी मसरूफ़ कर लूं,

मैं ख़ुद को ज़िदंगी में,

तेरे नाम का एक लम्हा,

दिन- रात मुझमें चहके…

(स्वलिखित)

ढूंढ़ लेती हैं तेरी यादें हमें हर दिन नये बहाने से…

ढूंढ़ लेती हैं तेरी यादें हमें,

हर दिन नये बहाने से,

क्या वो भी वाकिफ़ हो गई हैं,

मेरे हर ठिकाने से।

गुज़र रही है ये ज़िदंगी,

हर रोज़ नये इम्तिहानों से,

हवाओं की ज़िद भारी पड़ गई,

जब चूका तीर कोई निशाने से।

एक सवाल बहुत सता रहा,

मिलकर भी हम क्यूं मिले नहीं,

जब मिलना ही नहीं था नसीब में,

फिर क्या हासिल हुआ हमें आज़माने से।

तरस रही हैं निगाह क्यूं,

पल भर के उनके दीदार को,

वो मेरा कभी हुआ नहीं,

जिसे छिपाते रहे हम सारे ज़माने से।

बहुत तकलीफ़ देता है वो,

जो ज़ख्म मिले बिना कुसूर के,

कैसे करूं मैं वो दर्द बयां,

जब चढ़े नशा बिना सुरूर के।

भरोसा करके समंदर पर,

नदी मीठे से खारी हो गई,

मोहब्बत की कोई वजह नहीं,

वो बेवजह ही हमारी हो गई।

मिला तो हमें रब भी नहीं,

क्या हासिल हुआ तकदीर पर इल्ज़ाम लगाने से,

दिल फिर भी धड़कता तेरे लिए रहा,

वो माना भी कब किसीके समझाने से…

(स्वलिखित)

आपको पसंद नहीं करने वाले लोगों से कैसे निपटे?

1- यह दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या करते हैं, या क्या चाहते हैं? आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लीजिये वे आपको पसंद नहीं करेंगे।

2- हालांकि यह दुनिया उन लोगों से भी भरी है जो आप को हर बात के लिए जज नहीं करते हैं, वे बिना शर्त आपसे से प्यार करते हैं। ऐसे लोग आपके अपने होते हैं।

3- उन लोगों को मनाने की कोशिश में अपने समय और ऊर्जा को बर्बाद मत करिये जो आपके अपने लोग नहीं हैं।

4- ऐसे लोग आपकी पहल को पूरी तरह से गलत समझेंगे और आप जो भी पेशकश कर रहे हैं उस पर विचार नहीं करेंगे।

5- उन्हें अपने रास्ते पर चलने के लिए मनाने की कोशिश मत करिये क्योंकि ऐसा करके आप केवल अपना समय और भावनात्मक स्वास्थ्य बर्बाद कर लेंगे।

6- आप उनके लिए नहीं हैं और वे आपके लिए नहीं हैं। नियति ने आप दोनों को जीवन के अलग-अलग रास्तों पर चलने के लिए चुना है।

7- उदारता पूर्वक ऐसे लोगों को अपने जीवन से जानें दीजिये और साथ ही आप भी जिंदगी में आगे बढ़िये।

8- जिंदगी की राहों पर अपने साथ चलने के लिए उन लोगों की तालाश करिये जो आपकी कोशिशों को पहचानते हों और उनकी सराहना करते हों।

9- आप जैसे हैं वैसे ही रहिए, आप सबकी पंसद नहीं हो सकते और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इतनी सी एक बात तूफ़ान को खल गई…

इतनी सी एक बात,

तूफ़ान को खल गई,

कागज़ की एक नाव थी,

जो समुंदर पर चल गई।

हवाएं बहुत तेज़ थीं,

मुश्किलें थीं बेपनाह,

लहरों से लड़ते-जूझते,

वो साहिल पर लग गई।

हैरत हुई किसी को,

किसी को रहा मलाल,

देखकर कमाल ये,

दुनिया फिर मचल गई।

चलती रही वो हर हालात में,

कभी बेपरवाह,कभी बेवजह

तूफ़ान भी आजमता उसे रहा,

हर रात, हर सुबह।

कोशिश तो बहुत की थी,

मगर उसे तोड़ न सका,

हौसलों की ये उड़ान थी,

जिसे तूफ़ान मोड़ न सका।

जब हार गया थक के वो,

पहचान तब बन गई,

कागज़ की एक नाव थी,

जो मिसाल एक बन गई।

ज़माने ने नहीं की है,

कभी परवाह ख़ाक की,

जमीन से उठी थी वो ,

मोती में जो बदल गई…

(स्वलिखित)