सिखाने को तो जिंदगी है बहुत कुछ सिखाती…

सिखाने को तो जिंदगी
है बहुत कुछ सिखाती
तुमको पढ़ना सिखा सके जो
वो किताब नहीं आती

कभी तो रूका करो तुम
हमारे लिए भी देखो
बिना मिले तुमसे अब
हमें नींद नहीं आती

मोहब्बत वो हसीन गुनाह है
जो ख़ुशी से हमने किया है
पर टूटता है दिल जब
कोई आवाज़ नहीं आती

तेरे इश्क में हम रूसवा
अब सरेआम हो गए हैं
चोरी किसी ने की है
और बदनाम हम हो गए हैं

कैसी है ये महफ़िल
कैसे हैं ये मेले
जहाँ तुम नहीं हो
वहां हम भीड़ में हैं अकेले

कभी हकीक़त लग रही हो
कभी ख्वाब हो तुम मेरा
ख्वाबों को हकीक़त से जोड़ दे जो
वो फ़रियाद नहीं आती

जब से तुम मिले हो
सिर्फ होश है गंवाया
वापस होश में ला सके जो
वो शराब नहीं आती…

मासूमियत को अपनी बचा के तुम रखना…

मासूमियत को अपनी,

बचा के तुम रखना,

ये दुनिया मतलबी बहुत है,

ख़ुद को छिपा के तुम रखना।

लोग जुबां से हैं जो कहते,

दिल में होता वो नहीं है,

कुछ ख्वाईशों को अपनी,

दिल में दबा के तुम रखना।

नये रास्तों पर चलोगी,

नए शहर भी मिलेंगे,

भरोसा जिन पर कर लो,

वो लोग नहीं मिलेंगे।

पुराने ज़ख्मों को अब तुम,

अपनी यादों में याद रखना,

जो वक्त गुज़र गया है,

उसका हिसाब रखना।

बातों के इस दुनिया में,

होते हैं बहुत मतलब,

कहने से पहले कुछ भी,

शब्दों को तुम परखना।

कभी चोट भी मिलेगी,

कभी सबक भी मिलेंगे,

जो कोई गिरा दे तो,

गिर के फिर संभलना।

जिसने अपना कभी ना समझा,

उसे अब कर दो पराया,

जो फिर भी भुला ना पाओ

तो ख़ुद को ग़लत ना समझना…

कमियाँ भी बहुत हैं हममें नुक्स भी बहुत हैं

हममें नुक्स भी बहुत हैं,

कमियाँ भी बहुत हैं,

देखती हो बहुत ग़ौर से,

हर ऐब तुम हमारा।

अगर कभी वक्त मिले तो,

ख़ुद पर भी ग़ौर करना,

कमियों से परे नहीं है,

ये वजूद भी तुम्हारा।

उस आख़िरी पन्ने पर,

बोलो क्या लिखूं मैं,

कोरा ही छोड़ दूँ या,

लिख दूँ नाम फिर तुम्हारा

लूट लेते हैं अपने ही,

अपना हमें बनाकर,

गै़रों को क्या पता है,

क्या राज़ है हमारा।

पहले-पहल तो उसने भी,

जी भर के था मुझे चाहा,

फिर एक दिन उसका दिल,

मुझसे भी भर आया

क्या दिलों से खेलना ही,

नया शौक है तुम्हारा,

वापस तुम मुझे कर दो,

टूटा ही दिल हमारा।

टूटकर फिर से जुड़ना,

सीखा अभी नहीं है

टूटा भी तो था वो ऐसे

कि फिर जुड़ा नहीं दोबारा…

ना इसे देखकर ना उसे देखकर

ना इसे देखकर,

ना उसे देखकर,

जिंदगी जी रहे हैं,

बस तुम्हें देखकर।

अब ना भी मिलो तो,

कोई ग़म नहीं है,

कुछ हम भी बदल गए हैं,

अब तुम्हें देखकर।

ना ज़हन में फिक्र है,

ना बातो में ही जिक्र है,

अब पलटती भी कहाँ हो,

तुम हमें देखकर।

कभी पूछती हो,

कभी रूठती हो,

अब कहती भी कुछ कहाँ हो,

तुम हमें रोककर।

तुम ही वो वजह हो,

तुम ही वो सज़ा हो,

कभी कुबूल होती नहीं जो,

तुम मेरी वो दुआ हो।

अब दिन भी बड़ा है,

रातें भी अब सज़ा हैं,

अब लिखते भी कुछ कहाँ है

हम तुम्हें सोचकर…

कभी इधर चल दिए कभी उधर चल दिए

कभी इधर चल दिए,

कभी उधर चल दिए,

जिसने जिधर कहा,

हम उधर चल दिए।

अफ़सोस है मँज़िलें,

फिर भी रूठी ही रहीं,

मुसाफिरों की तरह हम भी,

फिर बेख़बर चल दिए।

कभी ख़ामोश तुम रही,

कभी चुप हम रहे,

साथ चलने की ज़िद में,

देखो हम किधर चल दिए।

ना तुम्हें हुई ख़बर,

ना हमें ही पता चला,

अंजाम से हो बेख़बर,

हम फिर बेअसर चल दिए।

दुनिया बुलाती भी रही,

दुनिया भुलाती भी रही,

बिना किसी के हुए हम,

फिर बेफ़िकर चल दिए।

ना तुम ही समझ सकी,

ना हम ही समझ सके,

बन के नासमझ दोनों,

फिर इधर-उधर चल दिए।

ये घर अब घर नहीं है…

ये घर अब घर नहीं है,

बस मकान है तुम्हारा,

वापस तुम मुझसे ले लो,

जो समान है तुम्हारा।

ख़ुद को खोकर भी तुझमें,

मुझे कहाँ तुम मिली हो,

शायद अब अलग-अलग हैं,

जो कभी मुकाम था हमारा।

रहते तो हम संग थे,

पर मिलते कभी नहीं थे,

कभी तुम गलत नहीं थे,

कभी हम सही नहीं थे।

जब-जब लगा तुम हो मेरी,

तुम हो गई पराई,

दूर मुझसे ऐसे हुई हो,

जैसे जिस्म से परछाई।

फिर एक वो दिन भी आया,

जब मुझे कर दिया पराया,

पल भर में बिखर गया वो,

जो कभी अरमान था हमारा।

अब रास्ते भी अलग हैं,

मँजिलें भी अब जुदा हैं

किस्मत ने भी लिखा था

शायद अंजाम यही हमारा…

कुछ जल गए कुछ बुझ गए

कुछ जल गए कुछ बुझ गए,

कुछ राख बनकर रह गए,

देखे थे तेरे संग जो सपने,

वो बस ख्वाब बनकर रह गए।

कुछ कह गए कुछ सह गए,

कुछ याद बनकर रह गए,

संग वक्त के कुछ जख्म भर गए,

कुछ बस दाग़ बनकर रह गए।

कभी आस में कभी काश में,

कभी अल्फाज़ बनकर रह गए,

ना तुमने कही ना हमने सुनी,

बस वो आवाज़ बनकर रह गए।

कभी धूप में कभी रेत में,

कभी तलाश बनकर रह गए,

ढूंढ़ते रहे तुम्हें हम दर-ब-दर,

और तुम प्यास बनकर रह गए।

कभी रस्म में कभी रिवाज़ में,

कभी कारोबार बनकर रह गए,

वक्त को इश्क पर तरजीह मिली,

और हम कर्ज़दार बनकर रह गए।

ग़ौर करो अगर तो हर चीज़ का है मतलब

ग़ौर करो अगर तो,

हर चीज़ का है मतलब,

ना समझो अगर तो,

हर चीज़ है फ़साना।

पुरानी होकर भी,

कभी बदलती नहीं हैं,

बातें कुछ नयी हैं,

मतलब है वही पुराना।

उठती है निगाह जिधर भी,

दिखता है एक साया,

मिलता है जो नहीं क्यों,

उसका है दिल दीवाना।

है रिवायत अजब इश्क की,

है अजीब ये फ़साना,

पाया नहीं है जिनको,

उन्हें खोने का है बहाना।

जब से चले गए हो,

जिंदगी ठहर गई है,

ना जीत का है मतलब,

ना हारने का है बहाना।

जीने को जी रहे हैं,

जिंदगी तेरे बिना भी,

सबकुछ सीख लिया है,

बस सीखा नहीं तुम्हें भुलाना।

जब साथ थे तुम मेरे तब धूप थी मुस्कुराती

जब साथ थे तुम मेरे,

तब धूप थी मुस्कुराती,

जब से तुम बदल गए हो,

तब से सुबह नहीं आती।

तेरा बिना भी मौसम,

हर साल बदल रहे हैं,

जब से तुम चले गए हो,

वो बरसात नहीं आती।

तुम्हारे बिना ये जीवन,

जैसे बेरंग पानी,

अगर कुछ मिला भी दूँ तो,

वो बात नहीं आती।

मोहब्बत के ये नियम,

सबके लिए अलग हैं,

कोई चैन से है सोता,

किसी को नींद नहीं आती।

अगर कभी मिले तो,

हाल ए दिल सुनाना,

ख़ामोशी समझा सके जो

वो किताब नहीं आती।

तेरी यादों ने कर दिया है,

बेहिसाब हमें तन्हा,

अब तो ख़ुद की महफ़िल भी,

हमें रास नहीं आती।

जानते हो सबकुछ पर अंजान बने हुए हो

जानते हो सबकुछ,

पर अंजान बने हुए हो,

तुम हो मन के मालिक,

पर गुलाम बने हुए हो।

चलते हो रोज़ सफ़र पर,

कहीं पहुँचते नहीं हो,

जिस रात की ना सुबह हो,

वो शाम बने हुए हो।

पैमानों की जरूरत,

अब किसे है यहाँ पर,

जिसका उतरता नहीं नशा हो,

वो नाम बने हुए हो।

जब करते हैं बातें ख़ुद से,

तब होता है जिक्र तुम्हारा,

जो मिलकर भी कहीं मिले ना,

वो मुकाम बने हुए हो।

शायद वक्त भी रोक लेते,

तुम्हारे लिए हम लेकिन,

जो कभी खुलती नहीं हो

वो दुकान बने हुए हो।

अगर कभी वक्त मिले तो

आईने में ख़ुद को निहारना

ख़ुद से ही जो बेख़बर हो

वो अंजाम बने हुए हो।