तेरी दुनियादारी से ऊबने लगा हूं मैं..

दुनिया तेरी दुनियादारी से ऊबने लगा हूं मैं,
वो मुझे चांद कहती थी उसी में डूबने लगा हूं मैं,
भटकते रहे उसकी तलाश में शहर-दर-शहर,
हर आईने में उसका अक्स ढूंड़ने लगा हूं मैं।

हर जख्म को दवा मिले ये मुमकिन तो नहीं,
नये दर्द से पुराने दर्द को बदलने लगा हूं मैं,
जो बादल न बरसे तो धरती की क्या ख़ता,
आजकल खुद से ही रूठने लगा हूं मैं।

वो बिखरी है मुझमें बनके खुशबू के मानिंद,
उसके ख्यालों में बसने लगा हूं मैं,
ख्वाबों से मुश्किल होती है हकीकत,
उनसे जुड़कर फिर से टूटने लगा हूं मैं।

काॅन्फिडेंस और ओवरकाॅन्फिडेंस के बीच क्या फर्क है?

1- जब आप सोचते हैं कि मैं इसे कर सकता हूं क्योंकि मैंने इसकी तैयारी की है तो यह आपका काॅन्फिडेंस है, जबकि जब आप सोचते हैं कि मैं इसे आसानी से कर सकता हूं और मुझे किसी भी तैयारी की आवश्यकता नहीं है तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

2- जब आप सोचते हैं कि मुझे दूसरों की भी सुननी चाहिये तो यह आपका काॅन्फिडेंस है,जबकि जब आप सोचते हैं कि दूसरों को सिर्फ मेरी ही सुननी चाहिये तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

3- जब आप सोचते हैं कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दूंगा और उन्हें मुझे सेलेक्ट कर लेना चाहिए तो यह आपका काॅन्फिडेंस है, जबकि जब आप सोचते हैं कि अगर वे मुझे सेलेक्ट नहीं करते हैं तो इसका मतलब है कि वे मूर्ख हैं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

4- जब आप हमेशा दूसरों से सम्मान चाहते हैं तो यह आपका काॅन्फिडेंस है जबकि जब आप हमेशा दूसरों का ध्यान चाहते हैं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

5- जब आप सोचते हैं कि मैं गलतियाँ करता हूं और उन्हें दोहराने की कोशिश नहीं करता हूं तो यह आपका काॅन्फिडेंस है, लेकिन जब आप सोचते हैं कि मैं परफेक्ट हूं और कोई गलती नहीं करता हूं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

6- जब आप पहले सोचते हैं फिर बोलते हैं तो यह आपका काॅन्फिडेंस है,जबकि जब आप पहले बोलते हैं फिर सोचते हैं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

7- ऐसा सोचना कि मैं यह कर सकता हूं यह आपका आत्मविश्वास है जबकि यह सोचना कि केवल मैं ही इसे कर सकता हूं यह यह आपका अतिआत्मविश्वास है।


8- किसी भी चीज के पक्ष और विपक्ष पर भली-भांति विचार करने के बाद रिस्क उठाना आपका काॅन्फिडेंस है, जबकि झूठे अहंकार के प्रभाव में लापरवाही से व्यवहार करना आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

9- मुझे पता है कि मैं कौन हूं यह आपका आत्मविश्वास है जबकि मैं उन्हें दिखाना चाहता हूं कि मैं मैं कौन हूं यह आपका अतिआत्मविश्वास है।

कड़वे सच

1- हम एक असली दुनिया में रह रहे हैं और असली दुनिया आदर्शों से बहुत दूर होती है।

2- हमें विश्वासघात अक्सर उन लोगों से मिलता है जिन पर हम सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।

3- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने अच्छे इंसान हैं, कुछ बार आपका दिल जरूर टूटेगा। अच्छी बात यह है कि समय के साथ सबकुछ ठीक हो जाता है और आप पहले से बेहतर और मजबूत हो जाएंगे।

4- जीवन निष्पक्ष नहीं है यहां बहुत से ऐसे कड़ी मेहनत करने वाले लोग हैं जो गरीबी और मुफलिसी का जीवन जी रहे हैं वहीं दूसरी ओर मूर्ख और आलसी लोग जीवन की सर्वश्रेष्ठ लक्जरी का आनंद ले रहे हैं।

5- आप लोगों से आपके साथ अच्छा व्यवहार करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। उम्मीद टूटने पर तकलीफ होती है लेकिन जीवन में आप लोगों से उम्मीद रखना भी छोड़ नहीं सकते हैं।

6- कोई भी कमजोर इंसान से प्यार नहीं करता है। शुरूआती दिनों में लोग आपसे सहानुभूति दिखाएंगे, लेकिन बाद में आप उनके लिए बोझ बन जाएंगे।

7- हर बार कर्म का नियम काम नहीं करता है। कभी-कभी आपको अपने अच्छे कर्मों के लिए बुराई का सामना करना पड़ता है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अच्छे कर्मों को करना बंद कर दिया जाए।

8- जीवन में सब कुछ एक्सपायरी डेट के साथ आता है चाहे वह आपकी खुशियां हों या फिर दुख यहां सबकुछ अस्थायी है।

9- आपके माता-पिता हमेशा आपके साथ नहीं होंगे। उनके साथ कुछ समय बिताएं और उनकी खुशी के लिए कुछ जरूर करिये ।

10- जब आप सोचते हैं कि आखिरकार सब कुछ ठीक हो गया है, तब जिंदगी हमेशा आपको झटका देकर एक बार फिर से उलझा देती है।

खुशियां कम और अरमान बहुत हैं

खुशियां कम और अरमान बहुत हैं

इस शहर में हर कोई परेशान बहुत है

करीब जाकर देखा तो मिलीं उनमें भी कमियां

दूर से तो उसकी शख्शियत आलीशान बहुत है।

कहने को तो नहीं है सच का कोई मुकाबला

लेकिन आज की दुनिया में झूठ की जान-पहचान बहुत है

जरुरत पड़ी उन्हें तो हर शख्श मुकर गया

कहने को तो इस शहर में उनके कद्रदान बहुत हैं।

मुमकिन है वक्त मिटा दे यादों को उनकी

लेकिन कैसे भुला दें उनको जिसके मुझ पर अहसान बहुत हैं

मुश्किल से मिलता है वो जिसे कह सकें हमारा

वैसे तो इस शहर में इन्सान बहुत हैं।

सुना था मिलती हैं मोहब्त के बदले मोहब्तें

जब मेरी बारी आयी तो यें जम़ाना क्यों हैरान बहुत है

जिस शहर में था इश्क का आशियाना

उस शहर में पत्थर के ख़रीदार बहुत हैं।

गलतियां

जिससे गलतियां न हो वो इंसान नही भगवान हो जाएगा। गलतियां सिखाती भी हैं और अनुभव भी देती हैं उसी सीख और अनुभव के आधार पर हम निर्णय लेते हैं। इसलिए हम मान लेते हैं नई गलती करने और पुरानी गलती दोहराने से आपका आशय जीवन में सही और गलत निर्णय लेने से है।

गलतियां करने से कोई बच नहीं सकता। जब तक सांसें चलेगी फैसले लेने होंगे।

हम आज जो भी हैं अपने बीते हुए कल में लिए गए फैसलों के कारण ही हैं। हम कल क्या होगें इसका फैसला हमारे आज के लिये हुए निर्णय करेंगे। निश्चित रूप से किसी के सभी निर्णय हमेशा न तो सही और न ही हमेशा गलत हो सकते हैं।

हर इन्सान के जीवन में कुछ सही तो कुछ गलत निर्णय होते है। आपका कोई निर्णय सही होगा या गलत इसका निर्धारण सिर्फ और सिर्फ समय करता है। अक्सर हमें आज जो सही लगता है वो भविष्य में गलत साबित होता है और जो गलत लगता है वो ही सही साबित हो जाता है। जब निर्णय सही साबित हो जाता है तो तारीफ और जब गलत हो जाता है तो आलोचना के साथ गलत होने की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है।

जब भी इन्सान कोई निर्णय लेता है तो वह यह सोच के नहीं लेता कि यह गलत साबित होगा। दरअसल निर्णय आज की परिस्थितियों में लिए जाते हैं जबकि कल की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें सही या गलत साबित करती हैं।

कल किसने देखा है? किसी ने नहीं पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।आप कितनी सटीकता से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं यह आपकी दूरदर्शिता को निर्धारित करता है और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करती है आपके निर्णय के सफल या असफल होने की संभावना को। अनुमान तो कोई भी लगा सकता है पर अनुभव के साथ अनुमान लगाने की संभावना बढ़ जाती है।

यही कारण है कि अनुभव के साथ लोगों से गलतियां होने की संभावना कम हो जाती है।

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा…

यादों की थोड़ी सी मिट्टी लेकर ,

आज उनसे दो अक्स बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज यारों की महफिल में,

फिर से कुछ रंग जमाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

फिर तोड़कर उन चेहरों को,

उनसे फिर दो शख्श बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज फिर से पुरानी तस्वीर लेकर,

साथ में कुछ तो वक्त बिताना,

कुछ तुम जैसा कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ….

रिश्ते

जीवन अपनों से ही परिभाषित होता है। जीवन की सार्थकता अपनों के बीच ही है। अपरिचित व्यक्तियों और अनजान स्थान पर जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो जाता है। अनजानी जगहों पर मुख्य बाधा विचारों के आदान-प्रदान में आती है। जहां हम किसी से व्यवहार नहीं कर सकते और कोई हमें समझ नहीं पाता है तो वहां रहने में मुश्किल आना स्वाभाविक ही है।

संबंधों के लिए भावनाओं की जरूरत होती है। भावनाओं के तार ही हमें एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं। जब तक भाव नहीं जुड़ते हैं तब तक संबंध मजबूत नहीं होते हैं और संबंधों में गहराई नहीं आती है।

जब कोई हमें समझने वाला होता है, जो हमारे सुख-दुख से संवेदित होता है, हमारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है तो वहां जिदंगी का फूल विकसित होकर खिलता है। जहां लोग अपने होते हैं वहां जीवन की परिस्थितियां लगभग एक जैसी होती हैं और मंजिल साथ मिलकर बढ़ने पर मिल ही जाती है।

जीवन के विकास में अपनत्व और प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है जो हमें केवल अपनों द्वारा ही मिल पाता है, दूसरे शब्दों में जहां अपनत्व मिलता है वहीं लोग अपने होते हैं।

सामान्य रूप से हम अपने संबंधियों और परिवार के सदस्यों को ही अपना समझते हैं पर ये सब मात्र शरीर और रक्त के संबंध हैं। सच्चे संबंध तो वहां बनते हैं जहां पर विचार और भावनाएं मिलती हैं।

विचार और भावनाओं के मेल से ही संबंधों में स्थायित्व आता है, उनमें प्रेम पनपता है और रिश्तों में गर्माहट आती है। सच्चे संबंध ही जीवन को सार्थक और बेहतर बनाते हैं। हमें भी भावनाओं को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि भावनाओं की मजबूती पर ही रिश्तों की इमारत खड़ी होती है।

इंसान के रिश्ते वक्त जरूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं, पुराने संबंध टूटते और नये बनते हैं। कभी अपने पराये तो कभी पराए अपने बन जाते हैं। पुराने लोगों की जगह नये लोग आते हैं और नया रिश्ता बन जाता है, लोग साथ छोड़कर चले जाते हैं और रिश्ता खत्म हो जाता है। कुछ संबंध एेसे भी होते हैं जो समय के परे हैं जिन रिश्तों में भावनाएं गहरी और सच्ची होती हैं उन्हें काल भी मिटा नहीं पाता है।

बिना मंज़िल का सफ़र

वो बिना मंजिल के सफर पे था,
वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था,
अनजानी सी ख्वाईशों से थी उसकी यारियां,
न जाने वो किसके असर में था।

बातों में उसकी थी दुनियादारी की कमी,
वो अपनी ही मौजों की लहर में था,
किसे सुनाता वो अपने चंद पन्नों के ग़म,
पता चला वो तो बुतों के शहर में था।

करता था वो उसकी हर बातों पर यकीं,
न जाने वो किस वहम में था,
कहने को तो छोड़ दिया था उसने भी उसे,
पर वो चेहरा आज भी उसके ज़हन में था।

खो गया था बिखेरकर खुशबू दिशाओं में सभी,
वो गुलाब जो कभी उसके चमन में था,
वो सोया ऐसे कि फिर सहर न हुई,
जिस्म लिपटा हुआ सफेद क़फन में था।

वो बिना मंजिल के सफर पे था
वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था…

नसीब

नसीब पासा फेंकने की तरह है और आप इसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। यदि सब कुछ आपकी इच्छा के अनुसार घटित होता है तो अच्छा है और यदि ऐसा नहीं होता है तो फिर अपने कौशल में सुधार करने के लिए काम करना जारी रखिये।

नसीब ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप नियंत्रित कर सकते हैं, जबकि कड़ी मेहनत आपके हाथ में है जो आपके चांसेज को बेहतर बनाती है। आप जिसे नियंत्रित नहीं कर सकते हैं उसके बजाय जो आपके नियंत्रण में है उस पर अपने ध्यान को केंद्रित करना हमेशा बेहतर होता है।

लोग आपसे अधिक प्रतिभाशाली हो सकते हैं लेकिन कड़ी मेहनत ज्यादा या कम करने का किसी के पास कोई बहाना नहीं होता है, जीवन में कड़ी मेहनत करने का अवसर सबके पास समान होता है।

जीवन की दो चाबियाँ कड़ी मेहनत और किस्मत हैं। जब ये दोनों चाबियाँ एक साथ काम करती हैं, तो आपके जीवन का ताला खुल जाता है।

कड़ी मेहनत सीढ़ियों की तरह है और किस्मत लिफ्ट की तरह है, कभी-कभी लिफ्ट फेल हो सकती है लेकिन सीढ़ियांं हमेशा आपको ऊपर की तरफ ले जाएंगी।

आपको अपनी कड़ी मेहनत का परिणाम हो सकता है तुरंत या फिर निकट भविष्य में ना मिले, लेकिन अंततः इसका परिणाम मिलकर रहेगा क्योंकि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती है।

कभी-कभी आप अपनी कड़ी मेहनत को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते हैं और लोग इस गलतफहमी में उसे आपका नसीब समझ लेते हैं।

सुना है वो हमको भुलाने लगे हैं….

सुना है वो हमको भुलाने लगे हैं,
जिनको पाने में हमको ज़माने लगे हैं,
वो उलझी सी बातें,वो धुंधले से चेहरे,
सपनों में फिर से आने-जाने लगे हैं।

पकड़कर उंगली जिन्हें चलना सिखाया,
वो रिश्ते ही हमें आज आजमाने लगे हैं,
छोड़ आए थे जिनको हम मंजिल के खातिर,
वो रास्ते फिर से हमें बुलाने लगे हैं।

थक गए थे हम बातों में मिलावट से लेकिन,
वो फिर से हमें मनाने लगे हैं,
पास से न सही, दूर से ही सही,
वो हमें देखकर मुस्कुराने लगे हैं।

क्या बात है, क्यों बदली सी फिज़ा है?
वो नज़रों से नज़रें मिलाने लगे हैं,
जो न सीखे थे जिंदगी में झुकना कभी,
वो सजदे पर सिर झुकाने लगे हैं।