लोग रखते हैं कैद सीने मे…

woman shaping heart with hands
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लोग रखते हैं,

कैद सीने में,

हमने सिर पर,

चढ़ा लिया है।

वो कहते हैं,

इश्क में सब जायज़ है,

हमने अपना,

दायरा बढ़ा लिया है।

अगर मिलो तो,

तुमसे कह दें,

जो न मिलो तो,

महसूस करना।

चाँद निकले,

तो हाँ समझना,

ना निकले,

तो समझो पहरा बढ़ा दिया है।

दोस्ती हो या बंधन,

साथ तुम निभाना,

हाथों में हाथ लिया है,

रिश्ता गहरा बना लिया है।

अपनी यादों की तहों में,

हमें तुम छुपा लो,

वक्त ने अँगुलियों से,

नया चेहरा बना लिया है…

© abhishek trehan

माना वो आवारा था…

मन…

ठहर जा रे मना,

क्यूँ भागे है चहुँ-दिशा,चहुँ-ओर,

मुँडेर पर पहरा बैठा दिया,

कहाँ थमा है,मन का शोर।

तन को तन से बाँध दिया,

मन को बाँध सके ना कोई डोर,

कच्चे दुनिया के सब धागे हैं,

बस गाँठें हैं हर ओर।

मैं आज,तुम कल हुई,

जैसे लहरें बाँटे नदी के दो छोर,

पल दो पल का है फासला,

दरम्यां फैला अँधेरा है घनघोर।

आँखों से आँखें यूँ उलझ गई,

जैसे पतंग से उलझे डोर,

हलचल सी दिल में मच गई,

जैसे दरिया में उठे हिलोर।

जब बोध हुआ तब ख़बर हुई,

बीत गया वो दौर,

रेत थी मुट्ठी से फिसल गई,

मिला ना कोई ठौर।

ज़िदंगी लगी है दांव पर,

बाज़ी पे नहीं है कोई जोर,

रूद्र तो मेरा भोला है,

विधि का विधान है बहुत कठोर…

© abhishek trehan

ज़िदंगी गुज़र रही है…

ज़िदंगी गुज़र रही है,

सब किरदार निभा रहे हैं,

सच का नहीं कोई पता है,

लोग बातें बना रहे हैं।

कोई कहता है सच नशा है,

कोई कहता है सच सज़ा है,

जिनको अपनी ख़बर नहीं है,

सच उनके लिए हवा है।

रातों का ख्वाब कह लो,

या दिल का अरमान बना लो,

बदलता सच नहीं है,

दूसरा तरीका तुम आज़मा लो।

दूर कहीं पर शायद,

एक दिया जल रहा है,

हवाएं नज़र रख रही हैं

थोड़ा अँधेरा पिघल रहा है।

कुछ ख़ुद पर बीत रही है,

कुछ दूसरों को परख़ रहे हैं,

हकीकत सिर्फ वही नहीं है,

जो लोग समझ रहे हैं।

जो बुझ रही है आग सीने में,

उसे क्या फिर से मैं जला लूँ

लोग सच का पता पूछते हैं

क्या आईना उन्हें दिखा दूँ…

© abhishek trehan

शुभ दीपावली

खुशियों से तो सब बोल रहे,

कभी दुखियारों से भी मिला करो,

महलों ने दरवाज़े खोल दिए,

माँ कुटिया पे भी कृपा करो।

कहाँ से लाएँ नैवेद्य वो,

क्या सजाएँ पूजा की थाली में,

रोटी के दो टुकड़े हैं,

माँ एक में खुश हो लिया करो।

बाहर फैला उजियारा है,

मन मेरा क्या ढूंढ़ रहा,

जो शब्दों में ना हो पाए बयाँ,

माँ मन को मेरे पढ़ा करो।

जैसे दीये-बाती का रिश्ता है,

मुझको भी वैसा बनना है,

कतरा-कतरा मैं जल जाऊँ,

माँ तुझमें ही फिर मिलना है।

चारों तरफ खुशियों का मौसम है,

हर तरफ झिलमिलाती दिवाली है,

जो महरूम है तेरी मेहर से,

माँ झोली उनकी भरा करो।

मुँडेर पर दीपक जला दिया,

रोश्नी खिड़की से आती है,

मैं काम किसी के आ जाऊँ,

माँ मेरी यही दिवाली है…

©abhishek trehan

जिक्र तेरा अपने लफ्ज़ों में हर बार करूँगा…

जिक्र तेरा अपने लफ्ज़ों में

हर बार करूँगा

कभी सुबह करूँगा

कभी शाम करूँगा

शौक तो नहीं है

जज़्बातों की नुमाईश का हमें

तुम्हें जो पसंद है

उसी जरिये से बात करूँगा

रूह तो रंगी थी

अब शब्दों को भी रंग लिया है

कभी ख्वाबों में भी मिले तो

इश्क बेशुमार करूँगा

सुकून सा मिलता है

तुम्हें सोचने से भी हमें

तुम्हें ही गँवाया था

तुम्हें ही आबाद करूँगा

जरूरी नहीं है इश्क मेरा

तुम्हें दिखाई दे

तुम हाथ दिल पे रखना

मैं आवाज करूँगा

आदत लगी है तुम्हारी

पता है ख़ुदा तुम नहीं हो

सलामत रहे दुनिया तुम्हारी

यही फ़रियाद करूँगा…

© abhishek trehan

ना हाल अच्छा है…

ना हाल अच्छा है,

ना ये साल अच्छा है,

फिर भी मुस्कुरा रहे हो,

ये कमाल अच्छा है।

ख्वाहिशें तो बहुत हैं,

फेहरिस्त लंबी नहीं है,

हर पल को जी रहे हो,

ये ख़्याल अच्छा है।

पुरानी बातें याद आकर,

सीने पर चढ़ रही हैं,

क्या लिखूँ, क्या मिटा दूँ

ये सवाल अच्छा है।

जाने दो उन्हें अब,

जो जाना चाहते हैं,

सब नहीं हैं दोस्ती के काबिल,

ये मलाल अच्छा है।

देखा है हमने अक्सर,

सच को अकेले चलते,

ना तसल्ली,ना फिकर है,

ये जंजाल अच्छा है।

ये हमें भी पता है,

गुमराह किसी ने किया है,

सवाल ही तो पूछा था,

ये इस्तेमाल अच्छा है…
© abhishek trehan

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गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी,

यूँ ही बेवजह ही,

ना ही पुराना फिर हुआ,

ना ही हुआ कुछ नया ही।

मायूस हैं क्यूँ लम्हे,

बेबस है क्यूँ निगाहें,

ढूंढ़ती है जिसको मँज़िलें,

वो कहाँ मिला ही।

ये ज़िदंगी धूप में जलकर,

बेज़ार हो रही है,

टुकड़ों-टुकड़ों में बंटकर,

ख़ुशियाँ हजार हो रही हैं।

दिल में कोई कसक है,

कोई खुमारी छा रही है,

लफ्ज़ों की जरूरत नहीं है,

ख़ामोशियाँ शोर मचा रही हैं।

सच को है सबने देखा,

पर रास नहीं आया,

तुम्हें झूठ का पता था,

फिर दिल से क्यूँ लगाया।

कोशिशें बहुत की हैं,

पर मिला कुछ कहाँ ही,

ना ही रात हमें मिली,

ना ही हिस्से में आई सुबह ही…

© abhishek trehan

रात बहुत भीग चुकी…

silhouette of girl during evening
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रात बहुत भीग चुकी,

साफ आसमान होना चाहिए,

तूफ़ान आकर गुज़र गया,

बाकी निशान होना चाहिए।

दिन ने अपनी बेबसी,

किसी से कही नहीं,

रात के बाद फिर सुबह हुई,

परछाई कहीं मिली नहीं।

आज एक ख़्वाब से,

सवाल हमने पूछ लिया,

पूरा करूँ या छोड़ दूँ,

सच हैरान होना चाहिए।

मँज़िल मिले ना मिले,

ये और बात है,

आग दिल में जल रही,

चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।

ले चलो हमें वहाँ,

जहाँ ख़त्म ना हो सिलसिला,

शुरूआत से अंजाम तक,

एक ही ईमान होना चाहिए।

वक्त बहुत बीत गया,

दिल मगर भरा नहीं,

कोशिशें यही कहती रहीं,

कहीं सच का मुकाम होना चाहिए…


© abhishek trehan


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माना वो आवारा था…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को,

दुनिया सब बातों में वजह ढूंढ़ती है,

इबादत को नहीं है वजह से कोई मतलब,

दुनिया ख़ुदा को बेवजह ढूंढ़ती है।

उड़नें में कोई बुराई नहीं है,

उड़ानें भी आसमानों की पनाह ढूंढ़ती हैं,

हवाओं का रूख ही काफी नहीं है

मंज़िलें भी रास्तों के निशां ढूंढ़ती हैं।

बातों में चेहरे हैं या चेहरों में बातें हैं,

रातें भी अँधेरों में जगह ढूंढ़ती हैं,

अँधेरों की अलग से कोई हस्ती नहीं है,

लंबी रातें भी अपनी सुबह ढूंढ़ती हैं।

डरने की कोई जरूरत नहीं है,

अनहोनी भी होने की वजह ढूढंती है,

जो होना है वो तो होकर रहेगा,

दूसरों के मातम में दुनिया गुनाह ढूंढ़ती है।

पहुँचेगा कहाँ तक ये कहना मुश्किल ज़रा है,

मँज़िलें है जिद्दी और मुश्किल हवा है,

किस्मत से उलझने की आदत है पुरानी,

कोशिशों के बिना ज़िदंगी बेवजह है।

भाग रही है परछाई के पीछे,

वक्त की रेत पर पैरों के निशां ढूंढ़ती है,

क्या दिल का धड़कना ही काफी नहीं है,

क्यों ज़िदंगी दूसरों में जीने की वजह ढूंढ़ती है…

© abhishek trehan

किसी अपने ने तुझे छला है…

आँखें कह रही हैं,

किसी अपने ने तुझे छला है,

इतनी शिद्दत से तोड़ दे जो,

वो अजनबी नहीं बना है।

जो किया है दूसरों ने,

तूने भी वही किया है,

दिखा के सुनहरे सपने,

जख़्म सीने पे दिया है।

क्या हाल है हमारा,

ये अब न तुम पूछो,

जिस पर ऐतबार था हमारा,

कत्ल उसीने मेरा किया है।

बहता रहा हूँ संग तेरे,

बनके मैं खामोश पानी,

सवाल तो बहुत थे,

कभी जिक्र नहीं किया है।

एक दाग़ सुलग रहा था,

अब राख बन गया है,

यूँ कीचड़ न उछालो,

अभी हिसाब नहीं किया है।

नए खेल मत अब खेलो,

जज्बातों से किसी के,

यहाँ से बरी हुए हो,

उसने माफ़ नहीं किया है…

© abhishek trehan