धूप मिटा दो,छांव मिटा दो …

धूप मिटा दो,छांव मिटा दो

मेरे सब अरमान मिटा दो,

छोड़ दो बस मुझको मुझमें,

बाकी सब पहचान मिटा दो।

कहां- कहां से जोड़ें ख़ुद को,

यहां-वहां से तोड़ें ख़ुद को,

ख़त्म करो ये किस्सा तुम भी,

बाकी सब निशान मिटा दो।

लगता नहीं है,कहीं दिल अब मेरा

रातें है लंबी,उलझा है सवेरा

छोड़ दो बस कुछ उम्मीदें मुझमें,

बाकी सब ग़ुमान मिटा दो।

बस इतनी सी बात हुई है,

सुबह से फिर शाम हुई है,

हुआ है अंबर का रंग गुलाबी,

फ़ीकी हर मुस्कान हुई है।

शायद अब फिर लौट न पाऊं,

दूर कहीं पर मुकाम बनाऊं,

छोड़ दो कुछ ख़ुद को मुझमें

बाकी सब अनुमान मिटा दो।

चोट पर फिर से चोट लगी है,

अश्कों पर फिर से रोक लगी है,

हुए हैं सुर्ख़ चांद-सितारे,

जाने किसकी टोक लगी है…

© abhishek trehan

मैं कोई किताब लिखूं…

मैं कोई किताब लिखूं,

उसकी तुम कहानी बनो

मैं कोई गीत लिखूं,

उसकी तुम ज़ुबानी बनो।

रास्ते तो बहुत हैं,

मेरी राह है कौन सी,

मैं कोई अंजाम लिखूं,

उसकी तुम निशानी बनो।

जिस्म से परे है वो,

मेरे इश्क का जो मुकाम है

भीगो दे जो मेरी रूह को,

तुम बूंद का वो पानी बनो।

सही-ग़लत, कुछ नहीं,

ये नज़र-नज़र की बात है

दुनिया ढूंढ़ती है नये को,

मेरे लिए तुम पुरानी बनो।

गुज़र जाएगा ये दौर भी,

कुछ साज़िश,कुछ इत्तेफ़ाक हैं

जिस्मों से जुड़ी रिश्तों की डोर है,

मेरे लिए तुम रूहानी बनो।

कांटें तो नसीब में बहुत थे,

हमें फूल भी कम मिले नहीं

ये ज़िंदगी खुदा की मेहर है,

इस ज़िंदगी की तुम मेहरबानी बनो…

© abhishek trehan

हंसने भी नहीं देते, रोने भी नहीं देते…

हंसने भी नहीं देते,

रोने भी नहीं देते,

होकर भी दूर हमसे,

ग़ैर होने नहीं देते।

तेरी आँखों में दिख रहा है,

बेबसी का एक मंज़र,

कहते भी कुछ नहीं हो,

चुप रहने भी नहीं देते।

जब वास्ता नहीं है रखना,

तो फिक्र किस लिए है,

तेरी आँखों में हमारा,

अब ज़िक्र किस लिए है।

जाना तो है हमें भी,

एक दिन यहां से,

तारों के टूटने से,

फिर इश्क किस लिए है।

रास्तों को बदलने से,

तक़दीर नहीं बदलती,

ना हुए तुम हमारे,

किसी का होने भी नहीं देते।

जिएं तो जिएं फिर,

कैसे तुम बता दो,

ख्वाबों में रोज़ आकर,

हमें सोने भी नहीं देते…

© abhishek trehan

कुछ शिकायतें ज़िदंगी की,कुछ ख्वाबों का तोड़ देना…

कुछ शिकायतें ज़िदंगी की,

कुछ ख्वाबों का तोड़ देना,

कोई हाल मेरा पूछे,

तुम आँखों से बोल देना।

टुकड़ों-टुकड़ों में ही सही पर,

इश्क उन्होनें भी किया है,

कोई नाम मेरा पूछे,

तुम रूख़ बातों का मोड़ देना।

उठती हैं जिधर भी निगाहें,

ढूंढ़ती है तुमको नज़रें,

जिस सफ़र की ना हो मंज़िल,

तुम उन रास्तों को छोड़ देना।

जो संग मेरे ना चल सको तो,

ख़ामोश ही तुम रहना,

मैं इशारों को समझ लूंगा,

तुम कसमों को तोड़ देना।

ज़िदंगी को पढ़ सकें सब,

ये मुमकिन नहीं है,

कहीं रात का है साया,

कहीं निकला दिन नहीं है।

कुछ सिलसिले शुरू होकर,

फिर ख़त्म नहीं होते,

कोई पहचान मेरी पूछे,

तुम निशान अपना छोड़ देना…

©abhishek trehan

आईना रोज़ देखता हूं फिर भी…

आईना रोज़ देखता हूं फिर भी,

तक़दीर का लिखा कभी दिखता नहीं,

बहुत मज़बूत हो जाते हैं लोग तब अक्सर,

जब पास खोने को कुछ भी बचता नहीं।

तुम रोज़ बख़्श देते हो मालिक मुझको,

ज़िदंगी के नए इल्ज़ामों से,

फिर भी फ़ितरत नहीं बदलती है मेरी,

दोहरता हूं गलतियों को नए बहानों से।

गुज़र जाती है जिंदगी भी अक्सर,

जीने की तैयारी में,

हाथ नहीं आता है कुछ भी,

ख्वाबों की हिस्सेदारी में।

जीता नहीं है आज में कोई,

लेकिन ये मर्ज़ पुराना है,

भागता हूं उन मज़िलों के पीछे मैं भी,

जिन्हें छोड़ के एक दिन जाना है।

सूरज-चाँद हैं रोज़ बुलाते,

वक्त कभी भी रूकता नहीं,

बदल जाते है रोज़ लिबास भी लेकिन,

हर ऐब छुपाने से छिपता नहीं।

बदल जाती हैं तारीखें फिर भी,

लिखा वक्त का कभी मिटता नहीं,

रोज़ जलता है एक दिया मंदिर में,

अंधेरा दिलों का फिर भी छंटता नही…

(@abhishek trehan)

झूठ ही सही पर कितना अजीब है…

झूठ ही सही,

पर कितना अजीब है,

जिसको दूर ख़ुद से किया,

वो ही दिल के करीब है।

मंज़िल मिले, ना मिले

ये और बात है,

अपना समझते जिसे हम रहे,

वो ही मेरा रक़ीब है।

ऐ ज़िदगी अब तू मुझे,

मेरी हैसियत ना बता,

जिसको तूने सब दिया,

वो ही सबसे ग़रीब है।

अब ऐसे माहौल में,

क्या दवा,क्या दुआ करें

क़त्ल मेरा उसने किया,

जो मेरा हबीब है।

ख़ामोशी से जो तुमने कहा,

हंसकर हमने वो सब सुना,

हर साज़िश को प्यार समझ लिया,

बड़ी नायाब ये तरकीब है।

चलते हम फिर भी रहे,

रास्ते हैं हैरान क्यूं,

जो ज़हर ख़ुशी से पी लिया

अब वो ही मेरा नसीब है…

कभी हम पूछ लेंगे, कभी तुम पूछ लेना…

कभी हम पूछ लेंगे,

कभी तुम पूछ लेना,

कभी हम चुप रहेंगे,

कभी तुम कुछ न कहना।

कभी आएंगी मुश्किलें,

कभी नये सबक भी मिलेंगे,

कुछ हम सीख लेंगे,

कुछ तुम सीख लेना।

जब चलोगे संग सफ़र पर,

तब धूप भी मिलेगी,

कहीं हम ठहर लेंगे ,

कहीं तुम ठहर लेना।

जब परवान चढ़ेगी मोहब्बत,

तो सवाल भी उठेंगे,

कहीं हम बोल देंगे,

कहीं तुम बोल देना।

जब बढ़ेंगी बेताबियां,

तो फिसलन भी बढ़ेगी,

कभी हम थाम लेंगे,

कभी तुम थाम लेना।

बनके अक्स तेरा,

अब तुझमें ही रहेंगे,

कभी हम देख लेंगे,

कभी तुम देख लेना…

मौसम को रंगों से इश्क हुआ है…

मौसम को रंगों से इश्क हुआ है,

गुड़ से मीठी बोली हो रही है,

वो पल-पल रंग बदल रही है मुझमें,

दुनिया कहती है बाहर होली हो रही है।

कुछ रंग कुछ, कुछ गुलाल उड़ा है

दूर दिलों का मलाल हुआ है,

उनको भी शायद ख़बर नहीं है,

नफ़रत भी खुशियों की रंगोली हो रही है।

नए सफ़र की शुरूआत हुई है,

उम्मीदों की सपनों से मुलाकात हुई है,

रात की दहलीज पर सुबह खड़ी है,

नए मौसम की पहली बरसात हुई है।

जाने किसका जिक्र हुआ है,

तारों को फिर से इश्क हुआ है,

आंखों में पुराने अश्क छुपाकर,

मीठा-मीठा सा रश्क हुआ है।

जिसने तेरा दर्द पढ़ा है,

उसने निगाहों से हर मर्ज़ पढ़ा है,

ज़िदगी भी उसकी शुक्रगुज़ार हुई है,

रूह पर भी उसका कर्ज़ चढ़ा है।

फाल्गुन भी है गहरी नींद से जागा,

हल्दी भी चंदन की रोली हो रही है,

वो पल-पल रंग बदल रही है मुझमें,

दुनिया कहती है बाहर होली हो रही है…

(स्वलिखित)

आओ खेलें होली…

कुछ पानी, कुछ रंग मिलाओ

आओ खेलें होली,

कुछ बूंदें,कुछ मोहब्बत बरसाओ

आओ खेलें होली।

कुछ मौसम का असर हुआ है,

कुछ दिल भी बेसब्र हुआ है,

मन की ख़ामोशी पर मत जाओ,

आओ खेलें होली।

पलकें भी तेरी भीग रही हैं,

बातें भी मेरी खींच रही हैं,

ख़त्म करो ये किस्सा तुम भी,

आओ खेलें होली।

कुछ ऐसे तुम रंग लगाओ,

जन्म-जन्म की प्यास बुझाओ,

परवाह ना करो फिसलने की तुम,

आओ खेलें होली।

दिल से दिल का तार जुड़ा है,

रंगों से मौसम सरोबार हुआ है,

मुझ पर अपना रंग चढ़ा दो,

आओ खेलें होली।

थोडा़ सा अभी रंग बचा है,

दूर कहीं गुलाल उड़ा है,

चेहरे को भी इंतज़ार है तेरा,

आओ खेलें होली…

उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है…

उसकी हर बात,

एक राज़ सी क्यूं है,

ढलती हुई ये शाम,

उदास सी क्यूं है।

खुशियों का ठौर,

कहां हम ढूंढे,

मंजिलें मुझसे,

नाराज़ सी क्यूं है।

जो मिला है,

उसकी परवाह कहां है

जो नहीं है,

उसकी तालाश सी क्यूं है।

हर चेहरे के पीछे,

छिपा एक चेहरा है,

झूठ में सच की,

आस सी क्यूं है।

बाहर उजाला,

दिलों में अंधेरा है,

उम्मीदें इतनी,

हताश सी क्यूं हैं।

जिंदगी भी हर पल,

छलक रही है,

एक बूंद की फिर भी,

प्यास सी क्यूं है।

दुनिया कह रही है,

कुछ तुम बदल गए हो,

दिल में फिर भी उठती,

एक काश सी क्यूं है।

जाने किस बात का,

गुरूर है हवाओं को

ज़िदंगी में इतनी,

ख़राश सी क्यूं है…