एक तेरे सिवा ज़िदंगी से…

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एक तेरे सिवा ज़िदंगी से
कुछ चाहा ही नहीं
जो चला गया लौटकर फिर
वो आया ही नहीं

ना जाने कैसे गुज़र गई
कितनी शामें, कितनी सुबह
जब आहट हुई तो पता चला
दिया हमने जलाया ही नहीं

हो सके तो हमें ले चलो
पहले यहाँ,फिर वहाँ
रात गहरी हो चली
पता किसीने बताया ही नहीं

भर दो मेरा शून्य तुम
यहाँ क्या काम है मेरा
कुछ वक्त के संग छिप गया
कुछ हमने दिखाया ही नहीं

लगा के आग दरख्त में
उठता है दिल में तमाशे का बहुत शौक
जब आग बुझी तो पता चला
घर हमनें महफूज़ बनाया ही नहीं

हो सके तो सिखा दो मुझे भी
भूल जाने का वो हुनर
पत्थर को ख़ुदा समझ लिया
तुमने कुछ बताया ही नहीं…
© trehan abhishek

मन के टूटे टुकड़े हैं…

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मन के टूटे टुकड़े हैं

जाऊँ मैं अब किस ओर प्रिये

कोई यहाँ गिरा,कोई वहाँ गिरा

हुआ कहाँ कोई बोध प्रिये

ऊँगलियों से बनी कोई मुट्ठी है

मुट्ठी में छिपी कोई रेखा है

उस रेखा को किस्मत कहते हैं

क्यूँ लिखे इतने अवरोध प्रिये

माना ये जीवन नश्वर है

नश्वर से जुड़ा मेरा हर नाता है

फिर भी दिल में क्यूँ कुछ चुभता है

कैसा है ये अपराध-बोध प्रिये

लगता सच क्यूँ लज्जित है

क्या लज्जा ही मर्यादा है

उस मर्यादा ने हमको बाँध दिया

फिर कैसा है ये क्रोध प्रिये

माया ने मुझको घेर लिया

झीना माया का हर धागा है

मैं अस्तित्व को अपने ढूंढ़ रहा

ये जीवन है गहरा शोध प्रिये

जो बीज था अब वो पेड़ बना

अब वो पेड़ कहानी सुनाता है

मिलना और बिछड़ना ही नियति है

शेष है सब संयोग प्रिये…

© trehan abhishek

#manawoawaratha

कभी गुलाब की तरह…

glass with petals and alcohol
Photo by Charlotte May on Pexels.com

कभी गुलाब की तरह

कभी सैलाब की तरह

ढूंढ़ता हूं मैं तुमको

किसी जवाब की तरह

न जाने फिर क्यूं

दिल में उम्मीद है जगी

कभी अँधेरी रातों में आ मिलो तुम

किसी ख़्वाब की तरह

तेरी मौजूदगी से लौट आई हैं

चेहरों की रौनकें

कभी फूलों की तरह महको

कभी शराब की तरह

न तुम हुई हमारी

न हम तेरे हुए

जी चाहता है तुम्हें फिर से पढ़ लूं

किसी पुरानी किताब की तरह

समंदर न सही

एक बूँद ही मिले

छा जाओ मुझ पे अब तुम

किसी मेहराब की तरह

अगर इश्क हुआ है

तो एहसास ये दिला दो

हमें अपने आगोश में फिर छुपा लो

किसी तालाब की तरह…

© abhishek trehan

#manawoawaratha

बड़ी मासूम है वो सूरत…

sea sunny beach sand
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बड़ी मासूम सी है सूरत
बड़ा मासूम है वो चेहरा
सपनों को है सच समझती
उसका हर ख्वाब है सुनहरा

खुश्बू सी महकती है
सारे घर में चहकती है
मेरी आवाज़ से मेरे मन को
वो न जाने कैसे परखती है

आई है बनके किस्मत
करने दूर सब अँधेरा
बेटी है रहमत खुदा की
और खुशियों का नया सवेरा

आँखें हैं उसकी हँसती
बातों में खुशियाँ हैं बसती
सस्ते है दर्द सारे
सलामत रहे घर ये मेरा

आती है जब भी मुश्किल
वो थामती है हाथ मेरा
नन्हीं ऊँगलियों ने लिख दिया है
खुशियों का नया बसेरा

करता हूँ तेरा शुक्राना
ख़ुदा कर्ज़दार हूँ मैं तेरा
दुनिया मागँती है चाँद-तारे
मैं माँगू बस उसका चेहरा…
© trehan abhishek

लोग रखते हैं कैद सीने मे…

woman shaping heart with hands
Photo by Artem Podrez on Pexels.com

लोग रखते हैं,

कैद सीने में,

हमने सिर पर,

चढ़ा लिया है।

वो कहते हैं,

इश्क में सब जायज़ है,

हमने अपना,

दायरा बढ़ा लिया है।

अगर मिलो तो,

तुमसे कह दें,

जो न मिलो तो,

महसूस करना।

चाँद निकले,

तो हाँ समझना,

ना निकले,

तो समझो पहरा बढ़ा दिया है।

दोस्ती हो या बंधन,

साथ तुम निभाना,

हाथों में हाथ लिया है,

रिश्ता गहरा बना लिया है।

अपनी यादों की तहों में,

हमें तुम छुपा लो,

वक्त ने अँगुलियों से,

नया चेहरा बना लिया है…

© abhishek trehan

माना वो आवारा था…

मन…

ठहर जा रे मना,

क्यूँ भागे है चहुँ-दिशा,चहुँ-ओर,

मुँडेर पर पहरा बैठा दिया,

कहाँ थमा है,मन का शोर।

तन को तन से बाँध दिया,

मन को बाँध सके ना कोई डोर,

कच्चे दुनिया के सब धागे हैं,

बस गाँठें हैं हर ओर।

मैं आज,तुम कल हुई,

जैसे लहरें बाँटे नदी के दो छोर,

पल दो पल का है फासला,

दरम्यां फैला अँधेरा है घनघोर।

आँखों से आँखें यूँ उलझ गई,

जैसे पतंग से उलझे डोर,

हलचल सी दिल में मच गई,

जैसे दरिया में उठे हिलोर।

जब बोध हुआ तब ख़बर हुई,

बीत गया वो दौर,

रेत थी मुट्ठी से फिसल गई,

मिला ना कोई ठौर।

ज़िदंगी लगी है दांव पर,

बाज़ी पे नहीं है कोई जोर,

रूद्र तो मेरा भोला है,

विधि का विधान है बहुत कठोर…

© abhishek trehan

ज़िदंगी गुज़र रही है…

ज़िदंगी गुज़र रही है,

सब किरदार निभा रहे हैं,

सच का नहीं कोई पता है,

लोग बातें बना रहे हैं।

कोई कहता है सच नशा है,

कोई कहता है सच सज़ा है,

जिनको अपनी ख़बर नहीं है,

सच उनके लिए हवा है।

रातों का ख्वाब कह लो,

या दिल का अरमान बना लो,

बदलता सच नहीं है,

दूसरा तरीका तुम आज़मा लो।

दूर कहीं पर शायद,

एक दिया जल रहा है,

हवाएं नज़र रख रही हैं

थोड़ा अँधेरा पिघल रहा है।

कुछ ख़ुद पर बीत रही है,

कुछ दूसरों को परख़ रहे हैं,

हकीकत सिर्फ वही नहीं है,

जो लोग समझ रहे हैं।

जो बुझ रही है आग सीने में,

उसे क्या फिर से मैं जला लूँ

लोग सच का पता पूछते हैं

क्या आईना उन्हें दिखा दूँ…

© abhishek trehan

शुभ दीपावली

खुशियों से तो सब बोल रहे,

कभी दुखियारों से भी मिला करो,

महलों ने दरवाज़े खोल दिए,

माँ कुटिया पे भी कृपा करो।

कहाँ से लाएँ नैवेद्य वो,

क्या सजाएँ पूजा की थाली में,

रोटी के दो टुकड़े हैं,

माँ एक में खुश हो लिया करो।

बाहर फैला उजियारा है,

मन मेरा क्या ढूंढ़ रहा,

जो शब्दों में ना हो पाए बयाँ,

माँ मन को मेरे पढ़ा करो।

जैसे दीये-बाती का रिश्ता है,

मुझको भी वैसा बनना है,

कतरा-कतरा मैं जल जाऊँ,

माँ तुझमें ही फिर मिलना है।

चारों तरफ खुशियों का मौसम है,

हर तरफ झिलमिलाती दिवाली है,

जो महरूम है तेरी मेहर से,

माँ झोली उनकी भरा करो।

मुँडेर पर दीपक जला दिया,

रोश्नी खिड़की से आती है,

मैं काम किसी के आ जाऊँ,

माँ मेरी यही दिवाली है…

©abhishek trehan

जिक्र तेरा अपने लफ्ज़ों में हर बार करूँगा…

जिक्र तेरा अपने लफ्ज़ों में

हर बार करूँगा

कभी सुबह करूँगा

कभी शाम करूँगा

शौक तो नहीं है

जज़्बातों की नुमाईश का हमें

तुम्हें जो पसंद है

उसी जरिये से बात करूँगा

रूह तो रंगी थी

अब शब्दों को भी रंग लिया है

कभी ख्वाबों में भी मिले तो

इश्क बेशुमार करूँगा

सुकून सा मिलता है

तुम्हें सोचने से भी हमें

तुम्हें ही गँवाया था

तुम्हें ही आबाद करूँगा

जरूरी नहीं है इश्क मेरा

तुम्हें दिखाई दे

तुम हाथ दिल पे रखना

मैं आवाज करूँगा

आदत लगी है तुम्हारी

पता है ख़ुदा तुम नहीं हो

सलामत रहे दुनिया तुम्हारी

यही फ़रियाद करूँगा…

© abhishek trehan

ना हाल अच्छा है…

ना हाल अच्छा है,

ना ये साल अच्छा है,

फिर भी मुस्कुरा रहे हो,

ये कमाल अच्छा है।

ख्वाहिशें तो बहुत हैं,

फेहरिस्त लंबी नहीं है,

हर पल को जी रहे हो,

ये ख़्याल अच्छा है।

पुरानी बातें याद आकर,

सीने पर चढ़ रही हैं,

क्या लिखूँ, क्या मिटा दूँ

ये सवाल अच्छा है।

जाने दो उन्हें अब,

जो जाना चाहते हैं,

सब नहीं हैं दोस्ती के काबिल,

ये मलाल अच्छा है।

देखा है हमने अक्सर,

सच को अकेले चलते,

ना तसल्ली,ना फिकर है,

ये जंजाल अच्छा है।

ये हमें भी पता है,

गुमराह किसी ने किया है,

सवाल ही तो पूछा था,

ये इस्तेमाल अच्छा है…
© abhishek trehan

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